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क्योंकि: अखबार या चैनल में काम करने वाला “हर शख्स पत्रकार” नहीं होता।

पुलिस विभाग के उदाहरण से ही लेते हैं क्योंकि दुनिया में कोई चर्चित सुरक्षा एजेंसी है तो वह पुलिस ही है। इनके सारे पदों के बारे में आमजन ठीक से जानते-पहचानते है क्योंकि ये विभाग 24 घंटे आमजन के बीच ही रहता है। यदि हम किसी कांस्टेबल को टीआई बोल संबोधित करेंगे तो वह बेहद ही खुश हो जाएगा, लेकिन किसी टीआई को कांस्टेबल कहेंगे तो वो अत्यंत आगबबूला हो उठेगा और हमारे लिए अपने दिमाग के किसी कोने में टीस भी भर लेगा तथा समय आने पर इसके परिणाम से वह हमें रूबरू भी करवा सकता है।

पुलिस सेवा में शामिल होने के सिर्फ चार ही रास्ते होते है। पहला यूपीएससी में सफल हुए तो आप सीधे SP बनेंगे, PSC में सफल हुए तो सीधे DSP बनेंगे व SI एवं कांस्टेबल की परीक्षा में सफल हुए तो सीधे SI व कांस्टेबल बनेंगे। मतलब कोई भी सीधे हेडकांस्टेबल, ASI, TI, ASP, DIG, AIG, IG, ADG व DGP नहीं बन सकता। यहाँ एक और खास बात है कि भले ही आपकी शिक्षा पीएचडी है लेकिन आपकी हाइट 5 फिट 7 इंच से कम है और सीना 32 इंच से कम है तब आप कांस्टेबल भी नहीं बन सकते। इसी प्रकार पत्रकारिता जगत की भी पोस्ट्स हैं। सभी मीडियाकर्मी तो कहला सकते है लेकिन हर कोई पत्रकार नहीं होता है। पत्रकार भी इंजीनियर होता हैं, जो मानव की छवि को गढ़ता हैं।

पुलिस विभाग की तर्ज पर आप किसी हॉकर को पत्रकार कहेंगे तो वह बेहद खुश होगा लेकिन यदि किसी पत्रकार को हॉकर कह देंगे तो स्वाभाविक है कि उसमें नाराजगी आएगी। ये सही है कि बिना सभी के सहयोग से कोई अखबार नहीं निकल सकता लेकिन इस अखबार को निकालने वाले सभी पत्रकार नहीं कहलाते। इसमें सभी की अलग-अलग भूमिका और पद है तो…

आओ पत्रकारिता जगत की पोस्ट (पद) के बारे में जाने-समझे

मालिक पहले सिर्फ एक पत्रकार ही अखबार का मालिक होता था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी भी यंग इंडिया अखबार के मालिक रहे हैं। 7 मार्च 1956 को राजस्थान पत्रिका अखबार की शुरुआत करने वाले श्री कर्पूरचंद क़ुर्लिस जी भी मालिक बनने से पहले एक जाने-माने पत्रकार थे। उज्जैन जिले के स्थानीय तौर पर बात करे तो 51 साल पहले दैनिक अवंतिका अखबार की शुरुआत करने वाले श्री गोवर्धनलाल मेहता जी पत्रकार थे। दैनिक अग्निपथ अखबार की शुरुआत करने वाले ठाकुर शिवप्रताप सिंह चंदेल जी देश के जाने-माने मूर्धन्य पत्रकार थे। 40 साल से अदम्य साहस की पत्रकारिता कर रहे साप्ताहिक अदम्य अखबार के मालिक श्री भूपेंद्र दलाल जी जाने-माने पत्रकार हैं। लेकिन वर्तमान दौर में कोई सटोरिया, भू-माफिया, शराब माफिया, गुटखा किंग, पार्टी नेता या चकलाघर संचालित करने वाला भी अखबार या चैनल का मालिक बन जाता हैं।

संपादक ये मालिक के बाद अखबार की सबसे बड़ी पोस्ट है। इस पोस्ट पर एक सही पत्रकार ही बैठ सकता हैं क्योंकि उसे 10-12 साल मैदान में पत्रकारिता कर सभी बीटों का ज्ञान रहता हैं। कौन सी खबर अखबार में कितनी और कहाँ पर जाएगी। ये सारे अधिकार संपादक के पास रहते हैं। ये बात और है कि अखबार मालिक चाहे तो अपने 8 वी पास चमचे को भी संपादक की कुर्सी पर बैठा सकता है।

पत्रकार  ये अखबार की रीढ़ की हड्डी होते है। इनकी खबरों के दम पर अखबार की साख रहती है और बाजार में वह टिका रहता हैं। अखबार में इनकी अलग-अलग बीट होती है। जैसे क्राइम, प्रशासन, खेल, धर्म, नगर निगम, राजनीतिक व अन्य। ऑफिस मीटिंग के बाद सुबह से शाम तक इन्हें अपनी-अपनी बीटों में रहना होता है और शाम को ऑफिस आकर इन्हें खुद अपनी-अपनी खबरें बनाकर देनी होती हैं। ये बात और है कि मीटिंग के बाद कुछ पत्रकार घर जाकर सो जाते है और शाम को ऑफिस आकर टेलीफोनिक पत्रकारिता को अंजाम देते हैं।

ब्यूरो प्रमुख यदि अखबार मालिक किसी शहर या तहसील में खुद के खर्च से ऑफिस मेंटेन कर वहाँ की खबरों के लिए स्थानीय पेज निकालता है तो इस स्थान पर बैठाए गए पत्रकार को ब्यूरो प्रमुख कहते है। ब्यूरो प्रमुख को खबरें भी लिखनी होती हैं।

कंप्यूटर आपरेटर ये पत्रकारों की लिखी खबर या संपादक द्वारा लिखी संपादकीय या फिर विज्ञापन को सही डिजाइन देकर संपादक द्वारा अखबार में बताए स्थान पर लगाते हैं।

मार्केटिंग इन्हें अखबार के लिए विज्ञापन लाना होता हैं। खबरें लिखने की वजह से पत्रकार सरस्वती पुत्र कहलाता है; लेकिन ये अखबार के लिए विज्ञापन के तौर पर धन लाते हैं इसलिए ये लक्ष्मीपुत्र कहलाते हैं। चूंकि लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू होता हैं। जिस पर किसी मार्केटिंग वाले के उल्लू रहने पर भी ये मालिक के लाड़ले के रहते है।

फोटो-वीडियो ग्राफर अखबार व चैनल मालिक की ओर से इन्हें किसी भी प्रेस कांफ्रेंस में सवाल पूछने के कोई अधिकार नहीं रहते हैं। सवाल पूछने का अधिकार उनके साथ आए सिर्फ पत्रकारों को ही रहता हैं। इनका मूल कार्य घटना-दुर्घटना, मेले-ठेले व अन्य सभी कार्यक्रमों को अपने कैमरे में कैद कर संबंधित बीट के पत्रकारों को जानकारी देना भर रहती हैं। इनके फ़ोटो तक पर केपशन पत्रकार ही देते हैं।

हॉकर  इनकी अखबार के लिए विशेष भूमिका होती हैं। ये कड़कती सर्दी हो, भीषण गर्मी हो या फिर मूसलाधार बारिश हो कि सारी बाधाओं को चीरते हुए सही समय पर पाठकों तक अखबार पहुचाते हैं।

एजेंट (पत्रकारों में अपनी गिनती करने वाले सबसे खतरनाक प्रजाति) ये राजधानी या बाहर के किसी शहर के 100-50 अखबार की एजेंसी ले आते हैं। इनका मूल काम कुछ और होता है। लेकिन अपने धंधे की छतरी के तौर पर ये अखबार या चैनल की एजेंसी ले आते हैं। चूंकि मालिक को इनसे धन प्राप्त होता है इसलिए इनके अनुरोध पर वे इन्हें एजेंट का नहीं बल्कि ब्यूरो प्रमुख का कार्ड बनाकर दे देते हैं जबकि ज्यादातर एजेंटों को पत्रकारिता के प शब्द की जानकारी भी नहीं होती हैं।

प्रेसक्लब अध्यक्ष व उसकी पूरी कार्यकारिणी इसके लिए पत्रकार होना जरूरी नहीं हैं लेकिन इसके लिए प्रेसक्लब के सदस्य व मतदाता होना बहुत जरूरी हैं। भले ही वह सदस्य व मतदाता शराब कारोबारी हो या फिर अन्य किसी धंधे में लिप्त हो। मतदान के बाद यदि वह चुन लिया जाता है तो वह अध्यक्ष व कार्यकारिणी सदस्य बन जाता हैं।

अधिमान्य पत्रकार शासन के नियमानुसार एक सही पत्रकार ही अधिमान्य पत्रकार बन सकता हैं। मतलब उसका पत्रकारिता के अलावा कोई पेशा न हो, उसकी शिक्षा कम से कम ग्रेजुएट हो, आपराधिक रिकार्ड न हो, पत्रकारिता के रिकॉर्ड के तौर पर उसकी कम से कम 5-6 साल की खबरों की कतरने हो। वे ही अधिमान्य पत्रकार बनने के पात्र होते हैं। ये बात और है कि जनसंपर्क/मंत्री अपने अधिकारों का प्रयोग कर किसी को भी अधिमान्य पत्रकार का कार्ड जारी कर सकते हैं। इसके पहले प्रदेश में 15 साल तक भाजपा की सरकार रही थी। जिस पर प्रदेश के सैकड़ों चाटुकार / दलालों के पास भी अधिमान्य पत्रकार के कार्ड हैं।

साभार : रामकृष्ण डोंगरे जी के फेसबुक। नोट : ये पोस्ट अज्ञात लेखक के निजी विचार हैं, सभी का सहमत होना जरूरी नहीं है।

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