Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ के एक मॉल में बांंटे रूपये और बनाया पत्रकारों का वीडियो !

जिन्होंने लिया धन उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम 
                      *जावेद अख्तर
रायपुर (06 दिसंबर 2018)। छत्तीसगढ़ के एक मॉल में स्थित एक कुख्यात दफ्तर में राजधानी के पत्रकारों का (हर किसी का नहीं) वीडियो बनाए जाने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। मॉल में स्थित इस दफ्तर में ईओ-सीओ और अन्य पदों में पदस्थ लोग किस राजनीतिक दल के लिए काम करते थे, यह किसी से छिपा नहीं है। इस कुख्यात दफ्तर की भूमिका ठीक वैसी ही थीं जैसे वर्ष 2003 में आकाश चैनल की थीं। खबर है कि इस दफ्तर में पत्रकारों को खबर मैनेज करने के नाम पर अच्छा-खासा रूपया-पैसा बांटा गया। पैसा-कौड़ी लेने के लिए एक से बढ़कर एक नामचीन लोग दफ्तर गए थे। इसमें कई प्रतिष्ठित अखबारों और चैनलों के रिपोर्टर-सीनियर रिपोर्टर और संपादक शामिल है। अब नाम उजागर होने के भय से सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम हैं।
     गौरतलब है कि प्रदेश के जनसंपर्क विभाग के पैसे से राजधानी के कुछ पत्रकारों को एक शख्स बैंकाक-पटाया ले गया था। सूत्रों का दावा है कि वहां भी पत्रकारों का वीडियो बनाया गया है। जनसंपर्क विभाग राजधानी के कुछ डेंजर यानि अपने इरादों से टस से मस नहीं होने वाले पत्रकारों का भी सेक्स वीडियो बनवाना चाहता था, विभाग में कार्यरत सरकार का दलाल अफसर कामयाब नहीं हो पाया।
  खैर… अभी नई सरकार नहीं बनी हैं, लेकिन अंदरखानों से एक से बढ़कर एक बात छनकर बाहर आ रही है।  बताया जाता है कि मॉल के दफ्तर में पैसे के लिए एक साथ कई पत्रकारों को बुलाया जाता था। जब एक साथ दस-बारह लोग रिशेप्शन में बैठे रहते थे तो सबका वीडियो बना लिया जाता था। फिर एक-एक को दफ्तर में एक पीए से मिलना होता था। यह पीए भी बातों में उलझाकर रखता था और वीडियो तैयार होता रहता था। जब लोग अपने जमा खर्च के लिए असल व्यक्ति से मिलता थे तब वह शख्स अखबार-चैनल के मालिक और संपादक का नाम लेता था और रिपोर्टरों को बताता था उसने सबकी कैसी-कैसी और कितनी सेवा की है।

  हरहाल इस सूचना का यह मकसद नहीं है कि; राजधानी के सारे पत्रकार, संपादक या मालिक बिकाऊ है। बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो पैसे यानि पैकेज के लिए बुलाए जाने पर भी दफ्तर नहीं गए। उन्होंने अपने मूल्यों को बचाए रखा। जो ऐसा नहीं कर पाए उनका वीडियो तो बन ही गया है। यह वीडियो इसलिए भी बनाकर रखा गया है ताकि निकट भविष्य में पत्रकार ज्यादा फूं-फां नहीं कर सकें। जिन पत्रकारों ने चुनाव में पैकेज नहीं लिया उनकी तस्दीक आप उनकी खबरों से कर सकते हैं। आप पाठक और दर्शक है आप बेहतर जानते हैं कि दबी- मरी किसे कहते हैं और असल खबर का निहितार्थ क्या होता है…?

Dinesh Soni

जून 2006 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा मेरे आवेदन के आधार पर समाचार पत्र "हाइवे क्राइम टाईम" के नाम से साप्ताहिक समाचार पत्र का शीर्षक आबंटित हुआ जिसे कालेज के सहपाठी एवं मुँहबोले छोटे भाई; अधिवक्ता (सह पत्रकार) भरत सोनी के सानिध्य में अपनी कलम में धार लाने की प्रयास में सफलता की ओर प्रयासरत रहा। अनेक कठिनाइयों के दौर से गुजरते हुए; सन 2012 में "राष्ट्रीय पत्रकार मोर्चा" और सन 2015 में "स्व. किशोरी मोहन त्रिपाठी स्मृति (रायगढ़) की ओर से सक्रिय पत्रकारिता के लिए सम्मानित किए जाने के बाद, सन 2016 में "लोक स्वातंत्र्य संगठन (पीयूसीएल) की तरफ से निर्भीक पत्रकारिता के सम्मान से नवाजा जाना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्यजनक रहा।

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