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पूर्वाग्रह से ग्रसित और द्वेषभावना पोषित, पांच पच्चीस लोंगो का समूह, अपनी नफरत की आग से अक्सर निर्दोष, निरीह व्यक्तियों को दग्ध कर रहा है। घृणित मानसिकता वाले कुछ लोंगो के द्वारा दुष्प्रचार और अफवाह फैला कर भीड़ के सहारे अपने मनोविकार और दुर्भावना को संतुष्ट करने ऐसे निरीह लोगों को चुना जाता है जो अपने घर, गांव, गृहनगर से सैकड़ो किलोमीटर दूर के होते हैं तथापि घटना स्थल के आस पास ना इनकी कोई पहचान होती है और ना कोई पहचानने वाला। ये जरूरी नहीं की माँब लीचिंग अर्थात भीड़ द्वारा पीट पीटकर इंसानो को मार डालने की घटना केवल एक वर्ग विशेष के साथ हो, नफरतों के देवता अपने उद्देश्यों की पूर्ति के मौके पर ना हिन्दू देखते हैं ना मुसलमान। कहि बच्चा चोरी और कहि गौवध को, अफवाह का आधार बनाया जाता है। भीड़ के सहारे, भीड़ के बीच विकृत मानसिकता वाले नफरतों के देवता स्वयं को वीरपुरुष सिद्ध करते लाठी पत्थर से लैस खुद ही न्यायाधीश और खुद ही जल्लाद बन जाते हैं।

हालिया घटना में मुम्बई के जोगेश्वरी स्थित हनुमान मंदिर के महंत सुशील गिरी महाराज, महंत कल्पवृक्ष गिरी उर्फ चिकने महाराज और नीलेश तेलगड़े को, कासा पुलिस स्टेशन अंतर्गत महाराष्ट्र दादरा नागर हवेली सीमा पर गड़चिंचले गांव के लोगों द्वारा बच्चा चोरी का आरोप लगाकर लाठी डंडे से पीट पीटकर मौत के घाट उतार दिया गया, अत्यंत अफसोस की बात है की घटना के वक्त मौके पर उपस्थित पुलिस ना सिर्फ मूक दर्शक बनी रही, बल्कि भीड़ का साथ दिया। इस घटना की जितनी भर्त्सना जितनी निंदा की जाये कम है। इसके पहले भी झारखंड में तबरेज, राजस्थान में पहलुखांन और उत्तरप्रदेश में अख़लाक़ को पीट पीटकर कर भीड़ द्वारा मारा गया, ये सभी घटनायें घोर निंदनीय है। भीड़तंत्र से लोकतंत्र को खतरा उत्तपन्न हो गया है, इसे रोकना होगा। इसकी वजहों पर ध्यान देना होगा, समाधान ढूंढने होंगे। माँब लीचिंग जैसे अपराधों को रोकने देश में कड़े कानून की आवश्यकता है।

मनोचिकित्सकों के अनुसार माँब लीचिंग और दंगों में एक आम प्रभावित करने वाला कारण है – सामूहिक भावना की वजह से सजा के डर का कम हो जाना। भीड़ के एकत्रित होने पर व्यक्तिगत भावना सामूहिक ताकत बन जाती है यही सामूहिक ताकत लोगों की मानसिक ऊर्जा को अपराध में बदल देती है। यदि किसी व्यक्ति में एक विशेष समुदाय के विरुद्ध एक मानसिक विकृति की तरह नफरत भरी है तो यही पैथोलॉजिकल विकृति आपराधिक गतिविधि को बढ़ावा देती है। यही पैथोलॉजिकल नफरत इतनी ज्यादा होती है की विकारग्रस्त व्यक्ति सही या गलत में अंतर नहीं कर पाता, उसकी नफरतों का शिकार पीड़ित व्यक्ति एक निर्दोष भी हो सकता है।

*किरीट ठक्कर।

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