धुप्प अंधेरे कमरे में
एक छोटा सा रौशनदान,
खुला रहने दो।

नजर आती है यहाँ से
थोड़ी हरियाली, थोड़ा आसमान
खुला रहने दो।

धुप्प अंधेरे कमरे में….
लकीर सी घुस आती है
सूर्य किरणें,
कभी छिटकती है चांदनी,
गर्म हवा के झोंके,
कभी भीगी ऋतु का बखान
सुनने सुनाने दो।

एक छोटा सा रौशनदान,
खुला रहने दो।

धुप्प अंधेरे कमरे में…..
दादे से लिपटता पोता,
नानी से नवासी।
पत्नि का निर्विकार मौन
बहन की हांसी।।
रिश्तो की ये तान-बान
गूँथने गुथाने दो।

धुप्प अंधेरे कमरे में ….
बेशक हर एक फांसीवादी हो जाये,
या समाजवाद का हो निशान।
हिन्दू हुआ कोई,
कोई रहे मुसलमान।
खुला रहने दो,
इंसानियत का एक रौशनदान।

नजर आती है यहाँ से थोड़ी हरियाली, थोड़ा आसमान।

खुला रहने दो
धुप्प अंधेरे कमरे में
एक छोटा सा रौशनदान।

किरीट ठक्कर

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