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ज़ुल्म के साए में लब खोलेगा कौन, सब चुप रहें तो फिर बोलेगा कौन ?

रायपुर (hct)। छत्तीसगढ़ सियासत में इन दिनों महाधिवक्ता कनक तिवारी को हटाए जाने को लेकर सरकार की चौतरफा आलोचना हो रही है। यह कोई पहला मौका नहीं जब कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार ने ऐसा कदम उठाया हो जिसका कि कहीं कोई आलोचना नहीं हुई हो। इसके पहले भी सत्ता मिलते ही भूपेश बघेल ने एक ऐसे पुलिस अधिकारी को जो जनरल डायर की भांति बस्तर के सैकड़ों निर्दोष आदिवासियों को नक्सली करार देकर मौत के घाट उतार दिया था और उसके इस कृत्य से प्रदेश सहित देश और यहां तक की विदेश में भी भारत की छवि धूमिल हुई तथा आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा जिसके चलते छत्तीसगढ़ की निवर्तमान भाजपा सरकार को उक्त पुलिस अधिकारी को उसके सारे अधिकार से मुक्त करते हुए उसे लूप-लाइन में डालना पड़ा, उसी क्रूर, आताताई पुलिस अधिकारी एसआरपी कल्लूरी को भूपेश बघेल ने ईओडब्ल्यू के सुप्रीमो बनाकर बस्तर सहित उन तमाम समाजसेवकों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सकते में दाल दिया था ! जिसे हटाए जाने को लेकर वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ला को अपने साथी पत्रकारों के साथ आमरण अनशन पर बैठना पड़ा।
तब भी भूपेश सरकार की काफी फजीहत हुई और जिल्लत महसूस करते उनके सिपहसलारों को धरना स्थल तक घंटों मानमनौव्वल के दौर पश्चात श्री शुक्ला जी का अनशन समाप्त करा दिया गया। काश, कि कमल शुक्ला जी का अनशन अगर एक दिन और चलता तो सरकार के लिए हाई कमान की तरफ से कोई कड़ा कदम उठाया जा सकता था जिसकी भनक इन्हें हो चुकी थी।

अब पुनः एक बार फिर आधी रात की भूपेश सरकार के नींद में लिए निर्णय ने उसे विवादों में घेर लिया है।


मामला है छत्तीसगढ़ के संवैधानिक पद पर पदस्थ महाधिवक्ता माननीय कनक तिवारी को उनके बिना इस्तीफा दिए उनको पद से हटाकर जातिवाद से ग्रसित सतीश चंद्र वर्मा को नियम विरुद्ध महाधिवक्ता घोषित कर दिए जाने का।
             
          ज्ञात होगा कि विगत दिनों से यह मामला काफी तूल पकड़ लिया है, और अब स्थिति ऐसी बन पड़ी है कि भूपेश नेतृत्व के लिए यह गले का फंस लगने लगा है।
अवगत होवें कि माननीय महाधिवक्ता कनक तिवारी को हटाए जाने का षड्यंत्र उनकी नियुक्ति के बाद से ही होने लगा था, इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ला, भूमकाल समाचार पर लिखते हैं – “मात्र पांच महीने के भीतर ऐसा कौन सा कारण हो गया कि, छत्तीसगढ़ सरकार के मुखिया को सरकार के द्वारा नियुक्त संवैधानिक पद महाधिवक्ता को झूठ का सहारा लेकर असंवैधानिक रास्ता अपनाते हुए हटाना पड़ा।”
इन पांच महीनों में यदि सरकार के कामकाज को लेकर समीक्षा की जाए तो भूपेश के महती योजना ” नरवा-गरुवा, घुरूवा-बाड़ी” में ही सिमट कर रह गई है। और उसके मंत्री-विधायक भी अब उससे कन्नी काटने में लग गए हैं। हालिया मामले को लेकर दिग्गजों की खामोशी बहुत कुछ बयां कर रही है जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह खामोशी तूफान के आने से पहले का भी हो सकता है। कुछ भी हो भूपेश का नेतृत्व खतरे में है। कहीं ऐसा न हो जाय जिसकी शंका हमने पहले ही जाहिर कर दिया था कि भूपेश के हाथ से कुर्सी छीन ली जाए और कमान किसी और के हाथों सौंप दी जाए वैसे भी लोकसभा में कांग्रेस ने कोई खास परिणाम नहीं लाया है इससे हाईकमान भी खुश नहीं है और संभवतः जिस तरह से माननीय कनक तिवारी जी से उनके बिना इस्तीफा दिए उन्हें हटा दिया गया है कहीं उसी तरह भूपेश बघेल को भी हाईकमान हटा दें; जिसकी संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता…

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