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“आपातकाल” के दर्द भरे नहीं, आज भी हरे हैं।

स्वाधीन भारत का सबसे गन्दा दिन 25 जून 1975 ई.

आपातकाल” मे पूंजीवादी न्यायपालिका का जनहित विरोधी चेहरा बेनकाब हो गया था। मुख्य न्यायाधिपति “रे” का व्यवहार रबर स्टाम्प सा था। “नो वकील, नो दलील, नो अपील” की ही गूंज थी। “आपातकाल” का उद्देश्य पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने तथा विपक्ष को समाप्त करने का था, जो सम्भव नहीं हो सका।
खाक़सार” को 26 जून 1975 ई. को रा़यपुर की कोतवाली पुलिस द्वारा आजाद चौक स्थित “भोला कुर्मी भवन”से मधुलिमये, बृजलाल वर्मा, पुरुषोत्तम कौशिक, गनपतलाल साव आदि की बैठक में भाग लेने के अपराध में गिरफ्तार किया गया था तथा उसे तनहा रातभर थाना में रखा गया था और “इन्दिरा शासन” का तख्ता पलटने के अपराध में मोतीबाग से गिरफ्तार बताकर 27 जून 1975 ई. को “केन्द्रीय कारागार, रा़यपुर” मे डाल दिया गया था,जहाँ से खाक़सार 2 जुलाई 1975 ई. को दो भारी जमानत, सालवेन्सी प्रमाणपत्र पेश करने के बाद जमानत पर रिहा किया गया था तथा लगातार 19 महीने तक नियमित न्यायालयीन उपस्थिति मे मुकदमा चलाया गया, इसी बीच जबकि खाक़सार 17 जून 1975 ई. को ही अपने गृह जिला प्रतापगढ़ (उ.प्र.) मे अपना न्यायालयीन कार्य समाप्त कर शाम को बिलासपुर-रा़यपुर के एक वैवाहिक कार्यक्रम में शामिल होने आया हुआ था और 26 जून 1975 ई. को ही रा़यपुर पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के बावजूद उसे प्रतापगढ़ (उ.प्र.) से फरार दिखा कर “मीसा” के अधीन “बिला जमानती वारन्ट” जारी कर के उसके घर तथा कार्यालय की सारी सम्मत्ति पुलिस उठा ले गई जिसमें “खाक़सार” को उस समय कम से कम 50,000/ रूपये की क्षति हुई।
त्तीसगढ़ मे भाजपा की नई सरकार अस्तित्व में आई तो उसने स्थानीय टाउनहाल मे मीसाबंदियों का सम्मेलन बुलाकर दोहरे मीसा प्रकरण के आरोपी “खाक़सार” का शाल,श्री फल देकर विशेष स्वागत किया था किन्तु जब मानदेय तथा प्रमाणपत्र देने की बात आई तो उसे भुला दिया गया। यही हाल उत्तर प्रदेश सरकार का भी रहा जहां कि स्थानीय नेताओं और जिलाधीश ने षडयंत्र करके सम्बन्धित मीसा प्रकरण की मूल पत्रावली ही गायब कर दिए।
आपातकाल के बाद प्रतापगढ़ (उ.प्र.) मे जितने भी जिलाधीश आए सभी उसी षडयंत्र मे अपनी मुहर लगाते रहे।प्रतापगढ़ के वर्तमान जिलाधीश द्वारा तो “खाक़सार” के किसी भी पत्राचार की ‘पावती’ अथवा ‘सूचना के अधिकार अधिनियम’ के अधीन जानकारी तक नहीं दिया गया, पूंजीवादी अराजकता की ऐसी कोई मिसाल नहीं। ऐसे तमाम देशभक्त,क्रान्तिकारियों के साथ ऐसा हो रहा है। मोदी-योगी शासन को इसकी तनिक भी चिन्ता नहीं इन्हे चिन्ता अपनी-अपनी कुर्सी की ही है।

“नेहरू भी जो कर न सके, वो करके दिखाया इन्दिरा ने, इन्दिरा भी जो कर न सकी वो कर दिखाएंगे मोदी।”

“मोदी तेरी सुबह की जय, मोदी तेरी शाम की जय”

देशभक्त, इन्कलाबी नागरिक मोर्चे का आह्वान; देशवासियों सावधान ! “धरा मांगती फिर बलिदान।”

साथियों, पूंजीवाद विरोधी नागरिक मोर्चे का गठन करो और “पूंजीवाद, पूंजीवादी व्यवस्था तथा पूंजीवादी राज को समाप्त करो” यही है वक्त की पुकार।

अधिवक्ता अवधनारायण त्रिपाठी।
खाक़सार

 

 

 

 

Dinesh Soni

जून 2006 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा मेरे आवेदन के आधार पर समाचार पत्र "हाइवे क्राइम टाईम" के नाम से साप्ताहिक समाचार पत्र का शीर्षक आबंटित हुआ जिसे कालेज के सहपाठी एवं मुँहबोले छोटे भाई; अधिवक्ता (सह पत्रकार) भरत सोनी के सानिध्य में अपनी कलम में धार लाने की प्रयास में सफलता की ओर प्रयासरत रहा। अनेक कठिनाइयों के दौर से गुजरते हुए; सन 2012 में "राष्ट्रीय पत्रकार मोर्चा" और सन 2015 में "स्व. किशोरी मोहन त्रिपाठी स्मृति (रायगढ़) की ओर से सक्रिय पत्रकारिता के लिए सम्मानित किए जाने के बाद, सन 2016 में "लोक स्वातंत्र्य संगठन (पीयूसीएल) की तरफ से निर्भीक पत्रकारिता के सम्मान से नवाजा जाना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्यजनक रहा।

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