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सड़कों व पटरियों पर दम तोड़ती सांसें…., जिम्मेदार कौन ?

” और आपकी कर्तव्यनिष्ठ छवियाँ भी इस तथ्य को प्रदर्शित करती हैं कि इतने बड़े लॉक डाउन में इतनी बड़ी संख्या में गरीब परिवार, मजदूर उन रास्तों पर कैसे निकल पड़े जो उनकी अंतिम यात्रा बन गई।
आप धन्य हैं, आपसे ज्यादा तो वे धन्य हैं; जिन्होंने इनकी बदौलत ही सत्ता पाई, और उन्हें ही रख दिया अंतिम पंक्तियों में……।”

समरथ को नहीं दोष…

सही कहा है संत तुलसीदास ने; सामर्थ्य को कोई दोष नहीं होता और ना ही उसके कार्य में कोई दोष निकाल सकता है।
देश में जिनके भरोसे सरकार बनती है और जो घंटो लाइन में लगकर इन्हें अपना मत देकर प्रतिनिधि बनाते हैं, वे ही जयचंद सत्ता में आते ही इनकी नमक का स्वाद भूलकर उन लोगों की मिठाइयों का स्वाद लेने लगते हैं जो ऐसे समय में एसी में होते हैं। आज इन नमक हराम प्रतिनिधि की बदौलत आम मजदूर परिवार अपने बच्चों के साथ सड़को और पटरियों पर अपनी जान गवां रहा है। और वे मस्त है, सियासत में….।

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में रेलवे लाइन की “पटरियों” पर पड़े ये “लाश” के “चीथड़े” सवाल कर रहे हैं,कि ये चिथड़े केवल “प्रवासी मजदूरों” के ही नही बल्कि उस “व्यवस्था” के भी हैं जिस व्यवस्था के तहत “मंत्री से लेकर संतरी” डीएम से लेकर कर्मचारी तक व्यापारी से लेकर सहकारी तक, “रसूखदार से लेकर आम नागरिक” तक सभी को “एक समान” अधिकार हैं, फिर उस व्यवस्था से ये “मजदूर” अलग कैसे ?

आज इस महामारी के समय जब पूरे देश मे “तालाबंदी है, राज्यों की सीमाएं बन्द है। जिलों की सीमाएं बन्द हैं। तहसील-तालुका बन्द हैं। गांव-कस्बे बन्द हैं। गली-मोहल्ले बन्द हैं। ऐसे समय इन प्रवासी मजदूरों के लिए व्यवस्था करने का जिम्मा आखिर किसने लिया था, किसने कहा कि जो जहां पर है वहीँ रहे, सरकार सभी सुविधाएं मुहैया करायेगी? आखिर क्यों ये मजदूर सैकड़ो किलोमीटर पैदल सड़कों व रेलवे लाइन पर चलने को मजबूर हुए? और इनमें से कई मौत के आग़ोश में आ गए… । और इन मौतों का जिम्मेदार कौन है, स्वयं वे या वे जिन्होंने उन्हें अपने कर्तव्य पालन का बोध तो करा दिया; किन्तु अपने कर्तव्य पालन करने में ढीले पड़ गए?

आज मजदूरों की जो भी दुर्दशा है, वह दयनीय है, दुखद है। “मौत” मजदूर को ले गयी; “रोटी” सवाल छोड़ गई, मजदूर रोटी को सीने से लगाए बढ़ते रहे अपनी मंजिल के लिए, मंजिल तक तो नहीं पहुंचे मौत ने गले लगा लिया। यह हमारी विडंबना है, जिंदा आदमी को कोई नहीं पूछता, मरने के बाद हर शख्स उनके लिए दिखावे का चोला ओढ़कर संवेदनाएं पेश करता हैं। यही हाल हुआ इन मजदूरों का जब तक जीवित थे, पैदल चलते रहे, मरने के बाद उनके शवों को स्पेशल ट्रेन से उनके क्षेत्र तक पहुंचाया गया। किसी मजदूर की मां, किसी की बेटी और किसी की पत्नी अपने बेटे, पिता या पति के इंतजार में नजरे जमाए बैठी होंगी। रेल की पटरी पर रोटियां बिखरी पड़ी थी, टूटी हुई चप्पल इस हादसे की कहानी बयां कर रही थी। कुछ कागज के नोट इधर-उधर बिखरे पड़े थे; खून के धब्बों में मुस्कुराती गुड़िया पड़ी हुई थी, शायद कोई बाप अपनी बेटी के लिए यह गुड़िया खरीद कर ले जा रहा होगा !

हाँ एक और गुड़िया थी; बीजापुर की 12 साल की जमलो, तीन दिन पैदल चल कर भी अपने गांव नहीं पहुंच पाई। अब सुनने में आया है की मुखिया ने उसके मरणोपरान्त 5 लाख की आर्थिक सहायता की घोषणा की है। उसी दिन की एक और खबर कोरिया जिला के उदलकछार से दर्रीटोला के बीच सुबह मालगाड़ी की चपेट में आने से ट्रेक पर चल रहे दो श्रमिक की मौत हो गई, जबकि साथ ही चल रहे दो अन्य श्रमिक बाल बाल बच गए। राजनांदगांव की अनिता हैदराबाद से पैदल निकली और नेशनल हाईवे 44 पर उसका प्रसव हुआ। पैदल लौटती पिथौरा में एक मां का बच्चा पेट में ही मर गया। एक ताजा घटना ने तो झिंझोड़ कर ही रहा दिया, वह यह कि छत्तीसगढ़ के कृष्णा साहू और उनकी पत्नी अपने दो छोटे बच्चों के साथ लखनऊ से साइकिल से निकले थे. बुधवार की रात एक गाड़ी ने उन्हें कुचल दिया। दोनों की मौत हो गई, बच्चे अनाथ हो गये…, ।

और ना जाने देश भर में कितने ही मामले, कुछ सामने आए कुछ सड़को व पटरियों के नीचे दब कर रह गए। महामारी की शुरुआत विदेश में रह रहे लोगों को लाने से हुई, 50 दिनों की विभीषिका के बाद भी उन उड़ानों के साथ ऊंचे लोग ऊँची पसंद के साथ कर्तव्यनिष्ठा जारी है। राजस्थान में फंसे लोगों के होनहार के लिए भी सैकड़ों बसे देश के कई स्थानो से चली, किंतु आम मजदूर व लोकतंत्र के आधार लोगों का जीवन अब भी अधर में नज़र आ रहा है। देखा जाये कि आज की तारीख़ तक छत्तीसगढ़ से अब तक इनके लिए कितनी बस, ट्रेन चलीं ? लेकिन 55 दिनों के बाद भी कहते हैं प्रयास जारी है !

सड़को पर खिसक रही बालपन की सिसकियां व पटरी पर पड़ी यह वही “रोटी” है, यह वही “पेट की भूख” है जिसके लिए ये मजदूर कभी 40 मंजिल ऊँची इमारत पर काम करता है, कभी 400 फिट गहरी सुरंग में काम करता है। कभी उच्च तापमान में काम करता है, कभी इन्हीं फटे अधनंगे कपड़ों में सर्द मौसम में काम करता है। कभी कई फिट गहरे बदबूदार “सीवर’ में घुसता है तो कभी ऊंचे बिजली के खम्बे पर चढ़ता है। और तो और आज जिस पटरी पर इन मजदूरों की “लाश” के चीथड़े पड़े हैं, इन्हीं मजदूरों की देन हैं ये बिछी हुई पटरियां। पटरी पर बिखरी ये वही “हवाई चप्पल” हैं जिन “हवाई चप्पलों” को पहने ये इस महामारी से बचने के लिए अपने घर-गांव जा रहे थे, यह महामारी इन हवाई चप्पलों से नही बल्कि “हवाई जहाज” की देन है।

आज शायद इन्हें महसूस हो रहा हो कि इन्होंने किन नमक हराम लोगों के हाथों में कमान सौपकर अपना प्रतिनिधि बनाया है। जो सत्ता देश की चला रहे हैं लेकिन दौलतमंद, विदेशी भारतीयों को अपना जमीर बेच चुके हैं। 50 दिनों से देश की सड़कों पर भूखे-प्यासे तड़प रहे गरीब परिवार, बच्चों के विषय में धृतराष्ट्र बन बैठे, वहीं विदेश से लाने वालों के लिए फ्लाइट पर फ्लाइट …!

शत शत नमन उन कोरोना योद्धाओं के लिए जो सड़कों पर चलने वालों पर लाठियां बरसा सकते हैं, मुर्गा बना सकते हैं, इन्हें इंसानियत का दुश्मन बनाने वाली तख्ती लगा सकते हैं, इस भयावह आर्थिक काल में चालान काट कर 56 इंच सीना ताने खड़े हैं; लेकिन सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर जाने वाले गरीब मजदूर परिवार, बच्चों को उनके घर पहुचाने के लिए प्रयास नहीं कर सकते..! और आपकी कर्तव्यनिष्ठ छवियाँ भी इस तथ्य को प्रदर्शित करती हैं कि इतने बड़े लॉक डाउन में इतनी बड़ी संख्या में गरीब परिवार, मजदूर उन रास्तों पर कैसे निकल पड़े जो उनकी अंतिम यात्रा बन गई।

आप धन्य हैं, आपसे ज्यादा तो वे धन्य हैं; जिन्होंने इनकी बदौलत ही सत्ता पाई, और उन्हें ही रख दिया अंतिम पंक्तियों में……। इनकी यात्रा के लिए फ्लाइट तो चल नहीं सकती, आखिर रेल चलाने का आदेश भी हो गया लेकिन बात किराया पर अटक रहीं हैं। देशभक्तों, इतनी कृपा कर देते कि टिकट काउंटर खुलवा देते तो ये गरीब तुम्हारी भी टिकट बुक करा देते, आखिर बड़े स्वाभिमानी होते हैं ये, लेकिन धोखा हर पांच साल में खाते हैं और शराब दुकान खोलने के जनहितकारी निर्णय के बाद इन्होंने साबित भी कर दिया कि ये व्यवस्था का कितना बड़ा हिस्सा होते है।

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