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लॉकडाउन : पलायन या अव्यवस्था, जिम्मेदार कौन ?

*भरत सोनी।

राजधानी। कोरोना वायरस जैसी वैश्विक महामारी को देखते हुए, प्रधानमंत्री श्री मोदी ने 22 मार्च को जनता कर्फ़्यू को घोषणा की। आम जनता ने प्रधानमंत्री मोदी के इस कदम को उचित ठहराते हुए इसका पूर्ण पालन किया और शाम 5 बजे प्रधानमंत्री के आह्वान पर सुरक्षा व स्वास्थ्य से जुड़े लोगों के उत्साहवर्धन के लिए जमकर ताली और थाली बजा कर जयघोष किया। शायद आम जनता को तब तक यह आभास नहीं था कि उनका यह उत्साह, अतिउत्साह में तब्दील होने वाला है। और बहनों और भाइयों के चिर परिचित अंदाज के साथ मोदी जी ने 24 मार्च को रात 12 बजे के बाद सम्पूर्ण देश में 21 दिन के लॉक डाउन की घोषणा कर दी।

कोरोना जैसी महामारी से निपटने प्रधानमंत्री ने अपने विवेक से जो कदम उठाया, उसे पूर्ण करने आम जनता ने समर्थन दिया, और अधिकांश आबादी ने स्वस्फूर्त स्वयं को लॉक डाउन कर प्रधानमंत्री के आह्वान का पालन किया, किन्तु लॉक डाउन के दूसरे व तीसरे दिन से ही दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश व आसपास के इलाकों से अचानक हजारों मजबूर मजदूर सड़को पर उतर आए, आखिर क्यों ? इन्हें सड़को पर उतरने की ऐसी क्या स्थिति उत्पन्न हो गई ?

जब जनता के प्रतिनिधि रोज गरीब मजदूर व जरूरतमंद लोगों के लिए घोषणा कर रहे थे तो इनकी क्या ऐसी मजबूरी थी कि इन्हें प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान, कि जो जहाँ है वही रहे, उन्हें सभी आवश्यक चीजें वही उपलब्ध करवाई जाएगी: इसके बाद भी उन्हें सड़को पर निकलना पड़ा। पूरे देश में डंडा चलाने वाले सुरक्षा व्यवस्था रखने वालों की नजरों से बचकर इतनी भीड़ आनंद विहार व दिल्ली के सड़कों पर कैसे आ गई ?

आखिर प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद उनका पालन करवाने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों सहित पंच, सरपंच, पार्षद, महापौर, विधायक के साथ साथ उस क्षेत्र के सांसद, मंत्री, पार्टी के हजारों कार्यकर्ता, पदाधिकारी इन सभी की ये जिम्मेदारी नहीं थी कि प्रधानमंत्री के प्रयासों में सहायक हो कर उन हजारों लोगों को ये विश्वास दिलाते कि मात्र 21 दिनों की बात है, आप जहाँ पर है वही रहें, घर पर रहें: सरकार और प्रतिनिधि सब आपके साथ हैं।

आखिर क्यों, इन गरीब मजदूरों को अपने बच्चों व परिवार के साथ सड़कों पर आना पड़ा। सैकड़ों किलोमीटर दूर की यात्रा पैदल करने मजबूर होना पड़ा, और जब ये समाचार मीडिया पर आने लगा तो सैकड़ों सेवादार पैदा हो गए। लॉक डाउन की स्थिति में, जबकि सम्पूर्ण देश में रेल, बस व अन्य आवागमन की सुविधाएं रोक दी गई है, सैकड़ों बसों को चला कर, प्रधानमंत्री के प्रयासों को विफल करने का कुत्सित प्रयास किया गया। और इन हजारों मजदूरों के साथ साथ अन्य लोगों की जान के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश की गई।

क्या, देश के अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को इस भयावह स्थिति का अंदेशा नहीं था ? जब देश में कोरोना की महामारी पहले चरण पर थी, तो विदेशों में रहने वाले भारतीयों को लाया जा रहा था, तब इन देशी भारतीयो की सुध क्यो नहीं ली गई, यह एक यक्ष प्रश्न है ? क्यों हमारे देश के होनहार जनप्रतिनिधियों ने इन्हें ये विश्वास नहीं दिलाया कि वे जहाँ पर है वहीं सुरक्षित हैं।

जरा सोचिए !
हमारे देश के हालात, लॉक डाउन ने हमें यह बता दिया है कि हमारे देश के लोगों की अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत है, मात्र 2 से 4 दिनों में ही हमें जगह जगह खाने के पैकेट व राशन लोगों को पहुंचाने पड़ रहे हैं, देश के कुछ खास वर्ग को छोड़ दिया जाये तो हर आम वर्ग की स्थिति गंभीर प्रतीत होती है। रोजी मजदूरी करने वालों को साथ साथ ठेले, खोमचे, पकौड़ा बेचने वालों, चाय बेचने वालों,ऑटो रिक्शा चलाने वाले, वाहन चालक वर्ग,कुली, हमाल,छोटी छोटी सी चीजें लेकर सामान बेचने वाले लोग, आज देश को 72 साल हो गए आज़ादी को ,लेकिन आज भी लाखों लोगों के पास स्वयं का आवास नहीं है, किराये पर जिंदगी गुजर गई,

इन 70 सालों में सरकारे आईं और गई, कई सरकार के मुखिया ने देश में गरीबी हटाने के नारों के साथ सालों राज किया, लेकिन गरीबी भी बड़ी हठी है कि अपना हठ छोड़ कर जाने को तैयार नहीं होती। गरीबी हटाने वाले कई आए और गये, लेकिन हां, कुछने एक काम जरूर किया, ग़रीबी के लिए एक रेखा जरूर खींच दी, अब लोग ग़रीब रेखा से जाने पहचाने जाते हैं। और इस गरीब रेखा पर हर साल करोड़ो रूपये का बजट होता है, लेकिन लोग इस रेखा से शायद ऊपर आना ही आने चाहते ? आखिर जनसेवक ओर कितना प्रयास करें, प्रयास करते करते ही पांच साल कब गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता।

कहानी यही खत्म नहीं होती, सारे देश में रोजगार कार्यालय व रोजगार मार्गदर्शन केंद्र स्थानीय स्तर पर खुले हैं। जिनमे प्रत्येक कार्यालयों में हजारों, लाखो प्रतिभावान लोगों का पंजीकरण किए गए हैं।लेकिन हर प्रतिभावान भाग्यशाली नहीं होता। हजारों में एक होता है। शेष चाय व पकोड़े बेचने की स्थिति में आ जाते हैं। आखिर रोजगार और नोकरी आये कहाँ से ? मजबूरी में पलायन ! का रास्ता ही दिखता है। रोजी रोटी की तलाश में बड़े बड़े शहरों की पनाह लेनी पड़ती है, आखिर, पापी पेट का सवाल है। परिवार की जिम्मेदारी है। सरकारे अपनी जिम्मेदारी निभाने में जितनी भी सक्षम हो, लेकिन इन्हें तो अपने परिवार की जिम्मेदारी बड़ी ईमानदारी से निभानी पड़ती है।

आनंद विहार व दिल्ली की सड़कों पर उमड़ा वो हुजूम भी कुछ यही बयां करता है; नहीं तो जिस दिल्ली में केंद्र व राज्य सरकार के दर्जनों मंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद, सहित कई पार्टियो के कर्तव्यनिष्ठ पदाधिकारी व कार्यकर्ताओं के रहते हजारों लोगों को अपनी भूख व बेरोजगारी के नाम पर कोरोना जैसी भयावह स्थिति में खुद व अन्य लोगों की जिंदगी दांव पर लगाने की क्या आवश्यकता होती।

लॉक डाउन के पूर्व इन्होंने अपने अपने क्षेत्रों से मजबूरी में पलायन किया, पश्चात भी इसी भूख व बेरोजगारी के भय ने इन्हें रिवर्स पलायन को मजबूर किया। शायद, हमारी व्यवस्था ने इनकी अर्थव्यवस्था को इतना मजबूत किया होता कि ये कम से कम एक माह जहाँ पर है वहीं पर रहकर अपना पालन पोषण कर लेते तो ये स्थिति नहीं होती।

देश के गंभीर हालात को देखा जाये तो कितनी गंभीर स्थिति से गुजर रहे हैं हम, एक ओर महामारी, दूसरी ओर अव्यवस्था में फसा निम्न वर्ग। लिखने और बोलने को बहुत है किन्तु ये श्रीराम का देश है, और श्रीराम जी के सम्मान में बड़ी ही सुंदर पंक्ति है, होइहैं वही जो राम रचि राखा—

इसके साथ ही भक्त तुलसीदास जी ने स्पष्ट किया है कि, समरथ को नहीं दोष गोसाईं। जिस पर विचार किया जाए तो ये भी स्पष्ट हो जाता है कि होना वही है जो रामजी चाहते हैं और करने वाले अगर सक्षम हैं तो जिम्मेदारी भी उन्हीं की ही होगी जो असमर्थ हैं।

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