हाईकोर्ट स्टे के बीच चला बुलडोजर, मस्तूरी में पुश्तैनी मकान ढहा
मस्तूरी में पुश्तैनी मकान ढहा, हाईकोर्ट आदेश के उल्लंघन के आरोप; प्रशासन ने बताया नियमानुसार कार्रवाई

बिलासपुर hct : जिले के मस्तूरी तहसील के खुदुभांठा गांव में ऐसा मामला सामने आया है जिसने सीधे तौर पर न्यायिक आदेश और प्रशासनिक कार्रवाई को आमने-सामने ला खड़ा किया है। आरोप है कि हाईकोर्ट के स्थगन आदेश के बावजूद 20 अप्रैल 2026 को एक 70 साल पुराने पुश्तैनी मकान पर बुलडोजर चला दिया गया। इस कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र में सवाल खड़े कर दिए हैं कि जब अदालत का आदेश मौजूद था, तो कार्रवाई कैसे आगे बढ़ गई।
पीड़ित अश्वनी टोण्ड्रे का कहना है कि उस दिन सुबह लगभग 11 बजे तहसीलदार शिल्पा भगत पुलिस बल और जेसीबी मशीन के साथ मौके पर पहुंचीं। बिना किसी अंतिम चेतावनी के कार्रवाई शुरू कर दी गई। परिवार का आरोप है कि स्थिति संभालने या दस्तावेज दिखाने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया और कुछ ही मिनटों में मकान को तोड़ने की प्रक्रिया तेज कर दी गई।
पट्टा दिखाने के बावजूद नहीं रुका बुलडोजर
परिवार का दावा है कि उनकी 80 वर्षीय बुजुर्ग मां ने 1981-82 का सरकारी पट्टा दिखाकर कार्रवाई रोकने की अपील की, लेकिन कोई राहत नहीं मिली। इस दौरान घर के भीतर मौजूद स्कूली बच्चे अपने सामान और किताबें मलबे से निकालते नजर आए। आसपास के लोगों का कहना है कि पूरा दृश्य बेहद तनावपूर्ण था और परिवार को लगभग असहाय स्थिति में छोड़ दिया गया।
स्टे ऑर्डर की कॉपी पर भी विवाद
सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब पीड़ित पक्ष ने हाईकोर्ट के स्टे आदेश की बात सामने रखी। उनका कहना है कि आदेश की कॉपी लेकर मौके पर पहुंचने के बावजूद मकान का एक हिस्सा पहले ही गिराया जा चुका था। आरोप यह भी है कि दस्तावेज दिखाने के बाद भी कुछ समय तक कार्रवाई जारी रही और बाद में ही मशीन रोकी गई।
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पीड़ित परिवार का दावा है कि यह जमीन शासकीय कब्जा नहीं बल्कि वैध पट्टे पर दी गई भूमि है। उनका कहना है कि खसरा नंबर 187/2 में अन्य निर्माण भी मौजूद हैं, लेकिन कार्रवाई केवल उनके मकान पर ही की गई। इसी आधार पर उन्होंने इसे चयनात्मक और भेदभावपूर्ण कार्रवाई बताया है, जिससे प्रशासन की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।
प्रशासन का बचाव और कानूनी स्थिति
तहसीलदार शिल्पा भगत ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कार्रवाई पूरी तरह नियमों के तहत की गई है। उनके अनुसार 24 अप्रैल की तारीख मकान खाली करने की नहीं बल्कि पंचनामा प्रक्रिया के लिए निर्धारित थी। प्रशासन का दावा है कि नोटिस अवधि पहले ही समाप्त हो चुकी थी, इसलिए कार्रवाई वैध थी।
फिलहाल मामला हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है और पीड़ित पक्ष अवमानना याचिका, एफआईआर और 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग कर रहा है। वहीं प्रशासनिक स्तर पर जांच की बात कही जा रही है, लेकिन यह विवाद अब सिर्फ मकान टूटने का नहीं, बल्कि आदेश और कार्रवाई के टकराव का प्रतीक बन चुका है।

