नकटी में कार्रवाई पर उठे सवाल, जनप्रतिनिधि की पहल के बावजूद उजड़े आशियाने
सांसद ने पहले ही गरीब परिवारों के आवास सुरक्षित रखते हुए शेष भूमि पर विधायक कॉलोनी बनाने का दिया था सुझाव, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई ने नई बहस छेड़ दी।

रायपुर hct : ग्राम नकटी विधायक कॉलोनी विवाद में चारागाह भूमि पर बसे गरीब परिवारों के मकानों को हटाने की प्रशासनिक कार्रवाई अब केवल अतिक्रमण हटाने का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह जनप्रतिनिधियों की सिफारिश और प्रशासनिक निर्णय के बीच तालमेल पर भी सवाल खड़े कर रही है। गांव के कई परिवार वर्षों से यहां निवास कर रहे थे और उनके सामने अचानक खड़े हुए विस्थापन के संकट ने पूरे घटनाक्रम को संवेदनशील बना दिया। इस बीच उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि क्षेत्र के सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने काफी पहले ही इस विषय पर राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए गरीब परिवारों के हितों की रक्षा का आग्रह किया था।

जानकारी के अनुसार सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने 7 जून 2025 को मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को लिखे पत्र में स्पष्ट सुझाव दिया था कि ग्राम नकटी की चारागाह भूमि पर प्रस्तावित विधायक कॉलोनी का निर्माण किया जाए, लेकिन जिन गरीब परिवारों के आवास पहले से वहां बने हुए हैं, उन्हें हटाना उचित नहीं होगा। उन्होंने अपने पत्र में यह भी कहा था कि गरीबों के मकानों को सुरक्षित रखते हुए शेष उपलब्ध भूमि पर ही विधायक कॉलोनी विकसित की जा सकती है। इस सुझाव का उद्देश्य विकास कार्य और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाए रखना बताया गया था।
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इसीग्राम नकटी विधायक कॉलोनी विवाद के क्रम में 27 जून 2026 को सांसद अग्रवाल ने पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक कर एक बार फिर यह अपेक्षा जताई कि किसी भी परिस्थिति में गरीब परिवारों के मकानों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। बैठक में यह भी कहा गया कि यदि किसी प्रकार की प्रशासनिक कार्रवाई आवश्यक हो तो उसका समाधान मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए निकाला जाए। स्थानीय स्तर पर यह संदेश भी गया कि प्रभावित परिवारों के हितों को प्राथमिकता देने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि विकास कार्य के साथ किसी जरूरतमंद का आशियाना न उजड़े।
हालांकि घटनाक्रम ने अगले ही दिन अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। 28 जून की रात सांसद अग्रवाल पार्टी की एक समिति की बैठक में भाग लेने के लिए दिल्ली रवाना हुए। इसी दौरान देर रात प्रशासन और पुलिस की टीम गांव पहुंची तथा क्षेत्र की घेराबंदी कर दी। इसके बाद 29 जून की सुबह मकानों को हटाने की कार्रवाई प्रारंभ कर दी गई। इस कार्रवाई के बाद ग्रामीणों में नाराजगी देखने को मिली और यह सवाल भी उठने लगे कि जब जनप्रतिनिधि पहले ही गरीब परिवारों के आवास सुरक्षित रखने का सुझाव दे चुके थे, तब उस पहल पर अपेक्षित स्तर पर अमल क्यों नहीं हो सका।
पूरे मामले ने अब प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया, जनप्रतिनिधियों की अनुशंसाओं की प्रभावशीलता और विकास योजनाओं में मानवीय दृष्टिकोण को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। ग्रामीणों का कहना है कि विकास कार्यों का वे विरोध नहीं करते, लेकिन यदि पहले से बसे गरीब परिवारों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था या उनके आवासों को सुरक्षित रखने का रास्ता निकाला जाता, तो विवाद की स्थिति टाली जा सकती थी। ऐसे में अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित पक्ष आगे इस मामले में क्या निर्णय लेते हैं और प्रभावित परिवारों की चिंताओं का समाधान किस प्रकार किया जाता है।


