Editorial

गांधी के बहाने इतिहास से मुठभेड़

जिस बंगाल का इतिहास रवीन्द्रनाथ ठाकुर के 'महात्मा' और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के 'राष्ट्रपिता' जैसे संबोधनों से जुड़ा रहा, उसी बंगाल से गांधी की प्रतिमा पर काला कपड़ा डाले जाने की तस्वीर ने इतिहास, राजनीति और लोकतांत्रिक असहमति पर नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

गांधी की प्रतिमा पर काला कपड़ा : इतिहास की सबसे बड़ी विडंबनाएँ अक्सर किसी संसद या अदालत में नहीं, बल्कि किसी चौराहे पर खड़ी एक खामोश प्रतिमा के सामने जन्म लेती हैं। हाल ही में सामने आई एक तस्वीर में महात्मा गांधी की प्रतिमा का चेहरा काले कपड़े से ढका दिखाई देता है। तस्वीर एक घटना भर नहीं है; वह अपने भीतर अनेक प्रश्न समेटे हुए है। आखिर वह कौन-सी बेचैनी है जो किसी विचार का प्रतिवाद करने के लिए उसके प्रतीक को ही ढँक देना चाहती है? क्या यह विरोध का नया व्याकरण है या इतिहास से संवाद करने का एक असहज तरीका? लोकतंत्र में असहमति का अधिकार निर्विवाद है, लेकिन जब विरोध विचारों से निकलकर राष्ट्रीय स्मृतियों के प्रतीकों तक पहुँच जाए, तब चर्चा केवल राजनीति की नहीं, समाज की सामूहिक चेतना की भी होनी चाहिए।

बंगाल की ऐतिहासिक विरासत और गांधी

विडंबना देखिए कि जिस बंगाल की धरती ने भारतीय पुनर्जागरण को दिशा दी, जिस बंगाल का इतिहास रवीन्द्रनाथ ठाकुर के ‘महात्मा’ और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के ‘राष्ट्रपिता’ जैसे संबोधनों से जुड़ा रहा, उसी बंगाल से यदि गांधी की प्रतिमा पर काला कपड़ा में ढके जाने का दृश्य सामने आता है, तो यह केवल एक स्थानीय घटना नहीं रह जाती। यह उस वैचारिक परिवर्तन की ओर संकेत करती है, जहाँ इतिहास के पात्रों को समझने के बजाय उन्हें वर्तमान राजनीतिक खाँचों में फिट करने की जल्दबाज़ी दिखाई देती है। ध्यान रहे, किसी भी लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से नहीं आँकी जाती कि वह अपने नायकों की पूजा करता है या नहीं, बल्कि इस बात से आँकी जाती है कि वह असहमति को किस भाषा में व्यक्त करता है।

देश के भीतर एक दृश्य, दुनिया के सामने दूसरा

सेशेल्स में महात्मा गांधी की प्रतिमा के समक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए। यह दृश्य गांधी की वैश्विक विरासत और भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को दर्शाता है।
एक ओर देश के भीतर गांधी की प्रतिमा विवाद का केंद्र बनती दिखाई देती है, वहीं विदेश में सेशेल्स स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए।

इसी बीच एक दूसरा दृश्य भी मौजूद था। उसी समय भारत के प्रधानमंत्री सेशेल्स में महात्मा गांधी की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गांधी आज भी भारत की नैतिक पूँजी माने जाते हैं। विश्व राजनीति में जब भी अहिंसा, सत्य और नागरिक प्रतिरोध की चर्चा होती है, तो गांधी का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। ऐसे में देश के भीतर और देश के बाहर उभरते ये दो दृश्य एक साथ खड़े होकर एक असहज प्रश्न पूछते हैं—क्या हम गांधी को इतिहास के व्यक्ति के रूप में स्वीकार करते हैं, या केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार उनका उपयोग करते हैं? यदि विदेशों में गांधी भारत का गौरव हैं, तो देश के भीतर वे विवाद का सबसे आसान प्रतीक क्यों बनते जा रहे हैं?

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जब प्रतीक बन जाते हैं राजनीति का हथियार

दरअसल, समस्या गांधी या किसी एक दल तक सीमित नहीं है। समस्या उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसमें विचारों से बहस करने के बजाय प्रतीकों को निशाना बनाना अधिक आसान समझ लिया गया है। कभी किसी महापुरुष की प्रतिमा पर कालिख पोती जाती है, कभी किसी की मूर्ति तोड़ी जाती है, तो कभी किसी की तस्वीर हटाकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश होती है। इससे इतिहास नहीं बदलता, केवल वर्तमान की अधीरता उजागर होती है। विचारों का उत्तर विचारों से दिया जा सकता है; प्रतिमाओं को अपमानित करके केवल क्षणिक सुर्खियाँ हासिल होती हैं। लोकतंत्र में विरोध का सबसे सशक्त माध्यम तर्क है, प्रतीकों पर प्रहार नहीं।

इतिहास से संवाद या स्मृतियों से संघर्ष?

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी स्मृतियों की विविधता रही है। यहाँ गांधी भी हैं, सुभाष भी; भगत सिंह भी हैं, अंबेडकर भी; सरदार पटेल भी हैं और रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी। इन सबके विचारों में मतभेद थे, लेकिन राष्ट्र की कल्पना उन्हें एक साझा धागे में पिरोती है। यदि हम हर ऐतिहासिक व्यक्तित्व को वर्तमान राजनीतिक चश्मे से देखने लगेंगे, तो अगली पीढ़ी को इतिहास नहीं, केवल आरोप और प्रत्यारोप की विरासत मिलेगी। प्रश्न यह नहीं है कि किसी व्यक्ति से सहमति है या असहमति; प्रश्न यह है कि क्या हम इतिहास के साथ संवाद कर रहे हैं, या उसे अपनी तात्कालिक राजनीति का पोस्टर बना रहे हैं।

किसी प्रतिमा के चेहरे पर डाला गया काला कपड़ा कुछ घंटों या दिनों बाद हट जाएगा। लेकिन उससे उठे प्रश्न इतनी आसानी से नहीं हटेंगे। वे बार-बार याद दिलाएँगे कि राष्ट्र केवल चुनावों से नहीं, अपनी स्मृतियों से भी बनता है; और स्मृतियों पर राजनीति जितनी गहरी होगी, इतिहास उतना ही मौन होता जाएगा। उस मौन की आवाज़ सुनने का धैर्य अभी भी बचा है या नहीं—शायद यही हमारे समय का सबसे बड़ा प्रश्न है।

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