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आधुनिकता के चलते युवा वर्ग भटकाव की ओर : ललित साव।

सामाजिक चिंतन

आधुनिक व दिखावे की जीवनशैली ने आज की पीढ़ी को भटकाव की ओर ले जा रहा है।जहां आज के शिक्षित व आधुनिक समाज की महिलाऐं दिन की शुरूआत की बातें, पैसा जमा होने वाली सोसायटी, कीट्टी, बर्थडे पार्टी व बैठक से होती है। तथा पुरूष वर्ग बच्चों को स्पेशल व आधुनिक जीवनशैली के तर्ज पर महंगी बाईक, मोबाईल देता हो तथा पैसे खर्चकर उंची पढ़ाई तो करवा लेता है, पर महत्वाकांक्षा के सपने इतना बड़ा देख लेता है कि यथार्थ मे दूर तक सच नही हो पाता।

विलासता जीवनशैली और अतिमहत्वाकांक्षा सपने पूरे ना होने की स्थिति में आज युवा खतरनाक कदम उठाने के मजबूर हो गये हैं, अपराध का रास्ता अख्तियार करने लगे हैं।आज भिलाई को जहां एजुकेशन हब कहा जाता है किन्तु अगर पर्दे के आड़ मे बारिकी से समाज के चौक चौराहों से लेकर मयखानों तक नजर डाले तो आज की अधिकांश युवावर्ग ज्यादा नजर आता है और इसी के चलते संगीन वारदात, चैनस्कैनिंग, नशाखोरी, छेड़छाड़ की वारदातें बढ़ने लगी है।

एक ओर जहां पैसा खर्चकर उंची शिक्षा करने के बावजूद रोजगार न मिले, तो अभिभावक को चिंताग्रस्त होना भी लाजमी है, इस परिस्थिति मे परिवारों मे तनाव बढ़ते जा रहा है। मासूम युवा गलतसंगतियों के चलते घर छोड़कर भगने जैसे काम करने लगे हैं, समाज मे मोबाईल के चलते परिवार बिखरने की शिकायतें भी ज्यादा बढ़ गयी है, आये दिन तलाक व अंतर्जातीय विवाह के प्रकरण समाज मे ज्यादा आने लगे हैं। समाज का व्यक्ति पैसे खर्च कर समाज मे मिल तो जाता है, पर घर का मुखिया किन परिस्थितियों मे पैसे की व्यवस्था करता है, इसे समझना भी समाज के ठेकेदारों को जरूरी है।

         जिस व्यक्ति से दबावपूर्वक पैसे लेकर सामाजिक फैसले किये जाते हों, क्या भविष्य मे समाज के प्रति उस व्यक्ति का उदार सोच रह पायेगा? समाज की संख्या गिनने से समाज मजबूत नहीं होगा बल्कि समाज के भीतर जाकर आंतरिक भावों को समझने की जरूरत है।           आने वाले समय मे सभी सामाजिक प्रबुद्धजनों से निवेदन है कि सिर्फ अच्छी नौकरी के आस लेकर न पढ़ायें बल्कि एक काबिल व्यक्ति बनाने के उद्देश्य से पढ़ायें। उंचे सपनेे देखना ठीक है पर पूरी हो ऐसा भी जरूरी नहीं। विपरीत परिस्थिति से निपटने की भी जरूरी शिक्षा दें ताकि बच्चा शुरू से ही जागरूक रहे।

विपरीत परिस्थितियों से निपटने के सरल उपायों को भी समाज के मुखियागणों को पटल मे रखने की जरूरत है ताकि संभावित घटनाओं पर रोक लगाई जा सके। मेरे इकाई की एक सामाजिक प्रकरण का उदाहरण देना चाहूंगा कि उच्च शिक्षित सरकारी नौकरी करने वाले नवदांपत्य दंपति का परिवार मतभेदों के चलते टूटने के कगार मे था, अंतराष्ट्रीय काउंसलरों के निर्णायक पद्धति के आधार पर हमने निर्णय किया और आज अगर वे दंपति फैसले को मजाक मे न लेते हुये, गंभीरता से अनुसरण या सिर्फ विचार कर लें तो उनका दांपत्यजीवन सफल हो जायेगा। जब भी किसी का भी हो, जैसे कि हम लोग उस दंपति के साथ आजमाया कि दांपत्यजीवन मे वैचारिक टकराहट हो तो दोनो पक्षों को ये लिखने के लिये दो पन्ने देवें कि पहले वे 10 बातें लिखें जो अच्छे लगते हों, फिर 10 बातें लिखें अच्छे नहीं लगते हों और इसको कोई तीसरा नहीं आपस मे एक दूसरे पढ़ने दें। निश्चित ही अच्छे नहीं लगने की संख्या ज्यादा होगी, पर एक ओर जहां कुछ अच्छाई कि बातें आयेंगी वहीं दूसरी ओर ये बताना पड़ेगा कि जीवन मे खुश रहना हो तो सिर्फ कमजोरियों की तलाश मे न रहें अच्छाईयों पर भी नजर डालें। बहुतायत देखा गया कि जिनकी पहली शादी सफल नहीं होती, उनकी दूसरी और तीसरी शादी भी सफल नहीं होती। वास्तव में सफल दांपत्यजीवन उसी का होता है या अंतरंग आपसी रिश्ते को मजबूत बनाना चाहते हों तो पति पत्नि एक दूसरे की जरूरत को समझें और एक-दूसरे का प्रेम पाना चाहते हों तो सिर्फ ये जानने की कोशिश करें कि सामने वाला चाहता क्या है? कोई भी समस्या गंभीर नहीं होती, बल्कि भावनात्मक रूप से आवश्यकताओं की पूर्ति से संबंधित होती है। जीवन मे भावनात्मक सोच की टंकी कम भरी होती है, तो हमारे रिश्ते प्रेम की नहीं बल्कि मजबूरी की होती है। अगर आप उत्कृष्ट भाव होने का अभिनय करते हैं तो यह चयन है। जिसमे जरूरी नहीं कि सकारात्मक हल या लाभ मिले। वैवाहिक जीवन जिनका भी सफल नजर आता हो या न आता हो।सभी को यही संदेश देना चाहूंगा कि समाज का हर वर्ग नीचे बताये एक किताब को जरूर पढ़नी चाहिए। इसमे दुनियां के महान विश्लेषकों और मनोवैज्ञानिक सहित कई शोधकर्ताओं के अनुभवों को निचोड़कर लिखा गया-किताब है “प्रेम की पांच भाषायें” लेखक डगैरी चैपमेन ( हिन्दी अनुवाद) को अवश्य पढ़ें। यह किताब पूरी दुनियां के समाज मुखियांओं को काउंसलिंग करने मे मददगार साबित हुआ है। आज के वातावरण मे समाज के मुखियागणों को गहन चिंतन, अध्ययनकर समाज को सही राह दिखाने की जरूरत है, संस्कार की शिक्षा देना एक फैशन हो चुका है। इत्तफाक से बड़े ओहदे पर पहुंचने के बाद हर कोई संस्कार और शिक्षा पर भाषण देता है, लेकिन दिया तले अंधेरा जैसी बात चरितार्थ है, वास्तव मे उसी के परिवार के भीतर सारे अवगुण मिलेंगे।सामाजिक शिक्षा वही ज्यादा देते हैं। कटुसत्य बात तो यह कि समाज के उच्च पदों पर वही लोग काबिज हैं जिनके परिवार मे सामाजिक प्रकरण ज्यादा रहते हैं, इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है। सामाजिक सुरक्षा की जवाबदारी अगर ऐसे लोगों के हाथों मे रहे तो समाज को क्या शिक्षा व संदेश देंगे? इसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं।

*ललित साव।

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