*रायपुर। छत्तीसगढ़ में चर्चित आईपीएस मुकेश गुप्ता फिर से चर्चा में हैं, सरकार में अपने विरोध में कारण बुरे समय से गुज़रते हुए उन पर लगातार तीन एफआईआर की जा चुकी हैं जिनको लेकर वे हाई कोर्ट फिर सप्रीम कोर्ट की शरण में जा चुके हैं; जहां उनके सभी मामलों में स्टे दिया गया है, उसी दौरान उन्होंने अपने गिरफ़्तारी के प्रयास, ड्राइवर के अपहरण और बेटियों के फ़ोन टेपिंग और उनका पीछा किए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था तथा एपेक्स कोर्ट ने नो अरेस्ट, नो हरासमेंट का आदेश दिया है, लेकिन सूत्रों से जो जानकारी छनकर बाहर आ रही है कि गुप्ता के पुराने वफ़ादार जो अब ईओडब्लू के मुखिया हैं, उन्होंने सरकार की नज़रों में ख़ुद को वफ़ादार साबित करने के लिए गुप्ता के ख़िलाफ़ ”बैक डोर” एफआईआर का प्रपंच रचा है। उन्होंने एक भ्रष्टाचार के पुराने मामले में आरोपियों को बचाते हए गुप्ता को घेरने की रणनीति बनायी थी, इसके लिए बाक़ायदा उन्होंने छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता को पत्र भी लिखा जो सूत्रों से प्राप्त हुआ है।

अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मुखिया का खेल बिगड़ गया, वरना एफआईआर की पूरी तैयारी थी। तब इस मुखिया ने भूतपूर्व भाजपा नेता जो लम्बे समय से भाजपा से बाहर भी है और डॉक्टर रमन सिंह के विरोधी भी को मोहरा बनाया है और इस खेल में न्यायालय का इस्तेमाल कर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की तोड़ सोची गयी है। बनायी गयी योजना के तहत पहले ये नेता थाना में शिकायत करेगा, वहाँ एफआईआर नहीं कराया जाना भी पहले से तय है, उसके बाद सक्षम न्यायालय में उस नेता से वाद दायर करवा कर ईओडब्लू पार्टी बनेगा और नेता की बात के समर्थन की रिपोर्ट देगा जिसके बाद उस न्यायालय से एफआईआर का आदेश लेने की प्लानिंग की जा चुकी है।

मज़े की बात ये है की ईओडब्लू/एसीबी में सूचना का अधिकार लागू नहीं है लेकिन उक्त भाजपा नेता की शिकायत में ईओडब्लू की एफआईआर के एक-एक पन्ने का डिटेल और नम्बर लेख किया गया है; जिस एफआईआर को साधारण तौर पर ज़िला पुलिस भी आरटीआई के तहत तीसरी पार्टी को देने को बाध्य नहीं हैं, उस अति संवेदनशील एफआईआर बुक को उस नेता के माध्यम से सार्वजनिक किए जाने से ईओडब्लू के मुखिया और उस नेता की मिली भगत साफ़ नज़र आती है और यह भी स्पष्ट लगता है की आवेदन बनाया मुखिया के निर्देशन में है और नेता ने मात्र दस्तखत किए होंगे अथवा पूरी एफआईआर की जिल्द उसको देकर ये आवेदन बनवाया गया होगा। दोनो ही स्थिति में इन दस्तावेज़ों की गोपनीयता भंग होना और साथ ही बड़े भ्रष्टाचारी को बचाना बेहद गम्भीर बात है, जिस मुखिया को भ्रष्टाचार ख़त्म करने की ज़िम्मेदारी है वह उसको बढ़ाने का काम कर रहा है, सूबे के मुखिया को भी ऐसे अफ़सरों से सावधान होने की ज़रूरत है जो उनकी आड़ में अपना उल्लू सीधा कर सरकार की छवि पर बट्टा लगाने पर तुले हुए हैं।

निश्चित ही इन गोपनीय दस्तावेज़ो की गोपनीयता भंग के साथ इन दस्तावेज़ो से छेड़छाड की सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इन सभी तथ्यों की पुष्टि प्राप्त दस्तावेज़ों से होती है जो आप इस ख़बर में साथ देख सकते हैं। ये दस्तावेज ईओडब्लू कार्यालय से प्राप्त हुए हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वीरेंद्र पांडेय की दस्तखत शुदा शिकायत और न्यायालय में बाद का प्रारूप भी का ईओडब्लू कार्यालय में होना बहुत गम्भीर है और ये दिखाता है कि ईओडब्लू के मुखिया को सुप्रीम कोर्ट की भी परवाह नहीं और उसने उसका भी तोड़ अपने अन्दाज़ में निकाल लिया है।

*उत्तम तिवारी

By Dinesh Soni

जून 2006 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा मेरे आवेदन के आधार पर समाचार पत्र "हाइवे क्राइम टाईम" के नाम से साप्ताहिक समाचार पत्र का शीर्षक आबंटित हुआ जिसे कालेज के सहपाठी एवं मुँहबोले छोटे भाई; अधिवक्ता (सह पत्रकार) भरत सोनी के सानिध्य में अपनी कलम में धार लाने की प्रयास में सफलता की ओर प्रयासरत रहा। अनेक कठिनाइयों के दौर से गुजरते हुए; सन 2012 में "राष्ट्रीय पत्रकार मोर्चा" और सन 2015 में "स्व. किशोरी मोहन त्रिपाठी स्मृति (रायगढ़) की ओर से सक्रिय पत्रकारिता के लिए सम्मानित किए जाने के बाद, सन 2016 में "लोक स्वातंत्र्य संगठन (पीयूसीएल) की तरफ से निर्भीक पत्रकारिता के सम्मान से नवाजा जाना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्यजनक रहा।

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