“गढ़बो नवा छत्तीसगढ़” के कर्णधार अभी सत्ता के नशे में मदहोश हैं नौ माह बीत चूका है। इतने महीने में तो गर्भ में पल रहे शिशु में भी हरकत होने लगती है, लेकिन इस भुलेश सरकार को कुछ भी याद नहीं। समूचे प्रदेश में कामकाज ठप्प है “विकास” का जन्म नहीं हो रहा छत्तीसगढ़ महतारी प्रसव को तड़प रही है और चीख रही है – भुलेश…, भुलेश…., भुलेश….
बिलासपुर सरकारी हास्टल में गांव के गरीब परिवार के बच्चे इसलिए पढ़ने रहने आ जाते हैं कि यहां आने के बाद उन्हें वो सब सुविधाएं मिलेंगी जो गांव में नहीं मिल पाती। गांव से मां बाप भी अपने बच्चों को कड़े मन से हास्टल में रहने भेज देते हैं कि; जो घर में उन्हें नही मिल पा रहा है, वो शहर के हास्टल में उनके बच्चों को मिलेगा। उनके बच्चे पढ-लिख कर बेहतर मुकाम हासिल कर लेंगे। लेकिन सोचिए यदि उसी हास्टल में बच्चों को खाने के लिए सड़ा चांवल मिलने लगे तो क्या हश्र होगा ?
ऐसी ही एक घटना कोटा विकासखंड के नवीन कन्या छात्रावास से उजागर हुआ है। यहां सरकारी बिल्डिंग बन गई है। यहां की व्यवस्था के लिए छात्रावास अधिक्षिका भी नियुक्त हो गई है और गांव से बच्चे भी रहने आ गए हैं। लेकिन, छात्रावास में बच्चों के खाने के लिए चांवल का आंबटन ही नहीं आया है। ऐसे में बच्चों के सामने भोजन की समस्या खड़ी हो गई है। सरकार; स्कूली बच्चों के लिए नई-नई पौष्टिक भोजन की योजना शुरू कर रही है लेकिन यहाँ तो हकीकत तो कुछ और ही बयां कर रही है।
धीक्षिका ने समस्या के समाधान के लिए कोटा बीईओ से सम्पर्क किया तो बीईओ ने एक लेटर निकालकर कोटा के ही गंज स्कूल से पांच क्विटल चांवल हास्टल को देने का निर्देश दे दिया ! कोटा बीईओ से जो लेटर निकला है उसके अनुसार गंज स्कूल में अगस्त माह के आबंटन में खपत के बाद 1832.00 किलो चांवल शेष है ! जिसमें से पांच क्विंटल चांवल हास्टल को देने की बात कही है और ये भी कहा है कि जब हास्टल का आबंटन आएगा तो स्कूल को वापस कर दिया जाएगा।
बीईओ के आदेश के बाद गंज स्कूल से हास्टल के लिए पांच क्विंटल चांवल दिया जाता है। लेकिन ये चांवल खाने के लायक तो बिल्कुल भी नहीं था। सालों से पड़ा चांवल सड़ चुका है, कीड़े और इल्लियों से भरे इस चांवल को ठेले में लादकर मशीन से साफ कराने के लिए ले जाया जाता है जहां इल्लियों से भरे चांवल को मशीन में डालकर साफ किया जाता है तथा उसे खाने योग्य बनाकर हास्टल में भेजा जाता है।

देखिए वीडियो….

  1. इस मामले के उजागर होने के बाद अनेक सवाल खड़े होते हेैं –
    क्या स्कूलों में जरूरत से ज्यादा आबंटन दिया जा रहा है ?
    जैसे गंज स्कूल में सिर्फ अगस्त माह के खपत के बाद 18 क्विंटल चांवल कैसे बच गया ?
    ज्यादा आबंटन के कारण चांवल की खपत नहीं हो पाती और चांवल सड़ने लगता है इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी ?
    कुछ समय पूर्व गंज स्कूल में मध्यान्ह भोजन चलाने वाले समूहों ने यहां के प्रधान पाठक पर नौ बोरा चांवल बेचने का आरोप लगाया था ?
    तो क्या ज्यादा आंबटन मिलने और चांवल बचने के बाद यही होता है ?
    सरकार ने जब हास्टल खोल दिया तो वहां चांवल का आंबटन क्यों नही दिया ?
    ऐसे कई ज्वलंत सवाल हैं जो सामने आ रहे है। लेकिन इन सबका जवाब देगा कौन ? कौन ये जिम्मेदारी लेगा कि बच्चों को सड़ा चांवल खिलाने की गलती उनसे हुई है ? क्या सड़े चांवल को साफ कराया जाकर खाने योग्य बनाना और बच्चों को देना गलत नहीं है ? हो सकता है खबर पढ़ने के बाद आपके मन में और भी सवाल उठे।
अपने प्रदेश में सब कुछ हो सकता है। एक तरफ सरकार पौष्टिक भोजन, अंडा और नास्ता देने की योजना शुरू करती है दूसरी तरफ जमीनी हकीकत ये कि बच्चों को कीड़ा और इल्लीयुक्त सड़े चांवल खाने को मजबूर होना पड़ता है। इस संबंध में कोटा बीईओ डा एम एल पटेल के बिलासपुर में होने की वजह से बात नहीं हो पाई। बहरहाल प्रशासनिक शिथिलता और उदासिनता से स्कूल पढ़ने वाले बच्चों को वो चांवल खाना पड़ रहा है जिसे शायद जानवर भी ना खाए।

साभार :dabangnewslive.com

By Dinesh Soni

जून 2006 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा मेरे आवेदन के आधार पर समाचार पत्र "हाइवे क्राइम टाईम" के नाम से साप्ताहिक समाचार पत्र का शीर्षक आबंटित हुआ जिसे कालेज के सहपाठी एवं मुँहबोले छोटे भाई; अधिवक्ता (सह पत्रकार) भरत सोनी के सानिध्य में अपनी कलम में धार लाने की प्रयास में सफलता की ओर प्रयासरत रहा। अनेक कठिनाइयों के दौर से गुजरते हुए; सन 2012 में "राष्ट्रीय पत्रकार मोर्चा" और सन 2015 में "स्व. किशोरी मोहन त्रिपाठी स्मृति (रायगढ़) की ओर से सक्रिय पत्रकारिता के लिए सम्मानित किए जाने के बाद, सन 2016 में "लोक स्वातंत्र्य संगठन (पीयूसीएल) की तरफ से निर्भीक पत्रकारिता के सम्मान से नवाजा जाना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्यजनक रहा।

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