किरीट ठक्कर
गरियाबंद (hct)। जल्द ही प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों के पुनर्गठन के साथ ही गरियाबंद जिले के सभी 38 सहकारी समितियां प्रभावित होंगी। अब तक संचालित सोसायटियों का ऋण व्यवसाय व सदस्यों का दायरा नियमों के मुताबिक कई जगह ज्यादा है। फिलहाल शासन ने पुनर्गठन की कवायद तेजकर दी है। इस बाबत बीते 25 जुलाई को राजपत्र में प्रकाशन भी हो चुका है।
सत्ता परिवर्तन के साथ ही प्रदेश की सभी प्राथमिक साख कृषि सहकारी समितियों को भंग कर दिया गया है, जबकि इन समितियों का कार्यकाल अभी 3 साल बाकी है, माना जा रहा है कि 15 साल की सत्ता के दौरान अधिकांश समितियों में भाजपा के लोग ही काबिज हैं। इसी वजह से सरकार ने ऐसा कदम उठाया है बहरहाल, समितियों के पुर्नगठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार जल्दी ही समितियों से पुर्नगठन के लिए प्रस्ताव मंगाया जायेगा। फिर दावा आपत्ति व शासन स्तर पर अनुशंसा की कार्रवाई होगी।
शासन का मानना है, कि बरसों पुराने इन समिति के सदस्यों की संख्या बढ़ गई है। वहीं ऋण व्यवसाय 4 से 5 करोड़ तक पहुंच चुका है जबकि, सामान्य क्षेत्र की ऐसी समितियां एक करोड़ तक का ही ऋण व्यवसाय कर सकती है। वहीं अनूसूचित क्षेत्र की समितियां के ऋण व्यवसाय की सीमा 50 लाख निर्धारित की गई है। अब नई पुनर्गठन योजना 2019 के अनुसार प्रभावित किसी भी समिति को अधिकतम दो समिति में विभक्त किया जायेगा, इसके साथ ही सदस्यों का ख्याल रखा जायेगा पुर्नगठन के बाद उक्त सभी समितियों का दो भागों में विभक्त होना तय है, वहीं जरूरत पड़ने पर कृषक सदस्यों को दूसरी समितियों में जोड़ा जायेगा। इस तरह से समितियों के ऋण व्यवसाय व सदस्यों की संख्या में एकरूपता लाने की योजना है। समितियों में पुनर्गठन की योजना के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं।
माना जा रहा है कि सत्ताधारी पार्टी संचालक मंडल में इसी रास्ते पहुंच सकती है। वैसे जिले की ज्यादातर सोसायटियों में अब तक भाजपा समर्थित लोगों का कब्जा रहा है। यही वजह है कि कार्यकाल के तीन साल बचे होने के बावजूद समितियों को भंग करने का विरोध हो रहा है। कई निर्वाचित प्रतिनिधि न्यायालय जाने की तैयारी में है। उधर शासन भी उच्च न्यायालय में कैविएट लगाने जा रहा है , ताकि इस पर किसी तरह की रोक न लग सके।

हाईकोर्ट जाने की तैयारी

गरियाबंद जिले में 38 सहकारी समितियां संचालित है जिसके संचालक मंडल का कार्यकाल 3 साल बाकी है ,ऐसे में सहकारी समितियों को भंग करने से संचालक मंडल के सदस्य काफी आक्रोशित है, जिसके लिये हाईकोर्ट जाकर स्टे लेने की तैयारी कर रहे है।

डिफाल्टरों को भी मिलेगा मौका

सहकारी समति में चुनाव लड़ने के लिऐ समिति का सदस्य होंना व प्रतिवर्ष लेनदेन करने वाले कॄषक ही चुनाव में भाग ले सकते है कई वर्षों से ऋण नही पटाने के कारण हजारों किसान चुनाव प्रकिया से वंचित थे , इस वर्ष कर्ज माफी के बाद से शत प्रतिशत किसान समिति से लेनदेन किये हैं ऐसे में अगर समिति भंग हो जाती है व फिर से चुनाव होता है तो कई वर्षों से डिफाल्टर रहे किसान भी इस बार चुनाव के मैदान में उतर सकते हैं।

By Dinesh Soni

जून 2006 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा मेरे आवेदन के आधार पर समाचार पत्र "हाइवे क्राइम टाईम" के नाम से साप्ताहिक समाचार पत्र का शीर्षक आबंटित हुआ जिसे कालेज के सहपाठी एवं मुँहबोले छोटे भाई; अधिवक्ता (सह पत्रकार) भरत सोनी के सानिध्य में अपनी कलम में धार लाने की प्रयास में सफलता की ओर प्रयासरत रहा। अनेक कठिनाइयों के दौर से गुजरते हुए; सन 2012 में "राष्ट्रीय पत्रकार मोर्चा" और सन 2015 में "स्व. किशोरी मोहन त्रिपाठी स्मृति (रायगढ़) की ओर से सक्रिय पत्रकारिता के लिए सम्मानित किए जाने के बाद, सन 2016 में "लोक स्वातंत्र्य संगठन (पीयूसीएल) की तरफ से निर्भीक पत्रकारिता के सम्मान से नवाजा जाना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्यजनक रहा।

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