लोककला के झेत्र मे बालोद ने फिर अमिट छाप छोड़ा…

“हंस झन पगली … ” पिक्चर के गीत-संगीत रचनाकार “विजय कुमार सुर्यवंशी”।

*विनोद नेताम
बालोद। छत्तीसगढ के तामाम सिनेमा घरो मे इन दिनो रिकार्ड तोड़ने वाली सतीश जैन के छत्तीसगढी पिक्चर इन दिनो धुम मचा रही है, खुद प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ छत्तीसगढ़ के केबिनेट मंत्रीयो ने इस पिक्चर को मल्टीप्लेक्स मे जाकर देखा और छत्तीसगढ के माटी के महक हमर लोक संगीत के तारीफ करते नही थके।
इस पिक्चर के गीत संगीत इन दिनो छत्तीसगढ के लोगो के जुबान पर है जिसकी रचनाकार बालोद जिला के एक छोटे से गांव ग्राम खैरवाही जो गुरूर ब्लाक से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर है,
विजय कुमार सुर्यवंशी
बालोद जिला से दूर रायपुर के नीजी स्टील कम्पनी मे कार्यरत है। आर्थिक रुप से कमजोर विजय कुमार सुर्यवंशी का लोक संगीत के क्षेत्र मे काफी दिनो से जुड़े रहे लेकिन परिवार के और पेट के मजबुरी मे रायपुर मे किराये के मकान मे रहकर अपनी जीविका चला रहे है।
ज्ञात हो कि छत्तीसगढ के मल्टीप्लेक्स के मालीको के खिलाफ छत्तीसगढ फिल्म इंडस्ट्री ने लंबी लड़ाई लड़ी तब जाकर सिनेमा मालीको ने इस पिक्चर को हरी झंडी दिखाई, लेकिन प्रदेश सरकार उस वक्त चौक गई जब छत्तीसगढ के सभी सिनेमा हालो मे जहाँ जहाँ ये पिक्चर लगी वहाँ वहाँ से टिकट नही मिलने की बात सामने आई।
लंबी अवधि  के बाद छत्तीसगढ़िया लोगो को एक बेहतरीन लोक कला और गीत संगीत से सजोय हमारे संस्कृति की छलक देखने को मिली और देखा जाय तो छत्तीसगढ के सरकारो ने हमारे लोककला को बढावा देने के बजाय इसे खत्म करने के दिशा मे पिछले कई सालो से लगे रहे।
करोड़ो रुपये खर्च कर मुबंई से बालीवुड के कलाकार बुलाये गये और छत्तीसगढ के गरीब जनता का पैसा पानी की तरह बहा दिये गये, जबकि लोककला और हमारी संस्कृति को बचाने के लिए विजय कुमार सुर्यवंशी जैसे गीतकारो और लेखको को बढ़ावा मिलना चाहिए था। बरहाल प्रदेश मे छत्तीसगढ़िया मुख्यमंत्री बनने के बाद लोक कला और छत्तीसगढ़ी संगीत के क्षेत्र से जुड़े लोगो की उम्मीद बढ़ गई है। विजय कुमार सुर्यवंशी :हमर छत्तीसगढ महतारी हमर संस्कृति लोककला ला आगे बढ़ाये बर अऊ मोर काम के तारीफ करे बर मोर पावन भूमि बालोद के जम्मो छत्तीसगढ़िया संगवारी भाई दाई-दीदी-बहनी ला गाड़ा गाड़ा जोहार है।

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