रासुका के बीच वीवीआईपी दौरे, पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल
राष्ट्रपति का दौरा संपन्न, राज्योत्सव में अमित शाह का आगमन निर्धारित; रासुका के औचित्य, रायपुर पुलिस कमिश्नरेट और राजनांदगांव में कथित हवाई फायर पर सरकार से सवाल

रायपुर hct : ३६ गढ़ में आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की स्थिति का हवाला देते हुए 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर 2026 तक राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) लागू किया गया है। दूसरी ओर, राष्ट्रपति का रायपुर और बस्तर दौरा सफलतापूर्वक संपन्न हो चुका है और राज्योत्सव के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का दौरा भी निर्धारित है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि प्रदेश की सुरक्षा स्थिति इतनी गंभीर है कि रासुका जैसे कठोर कानून की जरूरत पड़ गई, तो फिर क्या राज्य की सामान्य कानून-व्यवस्था और वीवीआईपी सुरक्षा के बीच कोई वास्तविक विरोधाभास है? या फिर रासुका का इस्तेमाल आम जनता के मन में कानून का भय पैदा करने तक ही सीमित होकर रह गया है?
एक तरफ सरकार सुरक्षा संबंधी चिंताओं के आधार पर असाधारण कानूनी प्रावधान लागू करती है, दूसरी तरफ राष्ट्रपति का दौरा सफलतापूर्वक संपन्न होता है और केंद्रीय गृहमंत्री के आगमन की तैयारियां जारी हैं। ऐसे में सरकार और प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि रासुका लागू करने के पीछे वास्तविक सुरक्षा चुनौतियां क्या थीं, किन परिस्थितियों ने इसकी जरूरत पैदा की और इसका उद्देश्य क्या है? सवाल किसी संवैधानिक पदाधिकारी के दौरे पर आपत्ति का नहीं, बल्कि सरकार के सुरक्षा संबंधी दावों और जमीनी हकीकत के बीच तालमेल का है।
जब पूरा प्रदेश प्रशासनिक और सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील दौर से गुजर रहा हो और सरकार खुद मानती हो कि हालात इतने गंभीर हैं कि रासुका का डंडा चलाना पड़ रहा है, तब ऐसे में वीवीआईपी (VVIP) मूवमेंट को हरी झंडी देना किसकी जिद या लापरवाही का नतीजा है?
राष्ट्रपति का दौरा संपन्न, अमित शाह का आगमन निर्धारित- फिर रासुका का औचित्य क्या?
राष्ट्रपति का 22 अक्टूबर को रायपुर और 23 अक्टूबर को बस्तर दौरा निर्धारित था, जो सफलतापूर्वक संपन्न हो चुका है। अब राज्योत्सव के अवसर पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का दौरा भी निर्धारित है। इन कार्यक्रमों के मद्देनजर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन राष्ट्रपति का दौरा सुरक्षा व्यवस्था के बीच संपन्न कराया जा सकता है और केंद्रीय गृहमंत्री के आगमन की तैयारियां की जा सकती हैं, तब प्रदेश में रासुका लागू करने के औचित्य और आवश्यकता को लेकर सरकार की ओर से स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी जाती?

रासुका लागू करना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि राज्य में प्रत्येक स्थान पर सुरक्षा व्यवस्था चरमरा गई है। लेकिन जब सरकार असाधारण कानून लागू करने का निर्णय लेती है, तो उसके आधार, आवश्यकता और उद्देश्य को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना भी उसकी जवाबदेही का हिस्सा है। क्या सरकार ने किसी विशिष्ट सुरक्षा खतरे को ध्यान में रखकर यह कदम उठाया है, या आम कानून-व्यवस्था की समस्याओं के समाधान के लिए कठोर कानून का सहारा लिया गया है? इन सवालों का जवाब मिलना चाहिए।
रासुका और पुलिस कमिश्नरेट : सुरक्षा सुधार या प्रशासनिक दिखावा?
सरकार के सुरक्षा संबंधी फैसलों की समीक्षा केवल रासुका तक सीमित नहीं रह सकती। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार ने रायपुर शहर में पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था भी लागू की है। इस व्यवस्था का उद्देश्य पुलिस को त्वरित निर्णय लेने और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों पर अधिक प्रभावी ढंग से कार्रवाई करने की शक्ति देना बताया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या नई व्यवस्था से आम नागरिकों को वास्तव में बेहतर सुरक्षा और न्याय सुलभ हो रहा है?
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पुलिस कमिश्नरेट लागू करने के बावजूद यदि जनता को सुरक्षा, जवाबदेही और त्वरित कार्रवाई के मामले में ठोस बदलाव दिखाई नहीं देता, तो इस व्यवस्था की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आलोचकों के लिए यह पूछना भी जरूरी है कि क्या पुलिस को अतिरिक्त अधिकार देने से व्यवस्था में वास्तविक सुधार हुआ है, या फिर पुलिस के हाथ में अधिकारों का एक नया ढांचा थमाकर सुधार का संदेश देने भर की कोशिश की गई है?
रासुका और पुलिस कमिश्नरेट, दोनों फैसलों को एक साथ रखकर देखने पर सरकार से यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या सुरक्षा के नाम पर कठोर कानून और पुलिस को अतिरिक्त अधिकार देना ही पर्याप्त है, या सरकार को उन वास्तविक कारणों पर भी काम करना चाहिए जिनके चलते कानून-व्यवस्था को लेकर चिंताएं उठती हैं?
एसपी (IPS) अंकिता का हवाई फायर: किस बात का खौफ?
इसी संवेदनशील माहौल के बीच राजनांदगांव में एसपी (आईपीएस) अंकिता द्वारा कथित तौर पर हवाई फायर किए जाने की घटना ने पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थिति उत्पन्न हुई थी कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को हवा में गोली चलाने की जरूरत महसूस हुई? क्या यह किसी वास्तविक आपात स्थिति से निपटने का प्रयास था, या घटनाक्रम के पीछे कोई दूसरी वजह थी? इन सवालों का जवाब संबंधित पुलिस अधिकारियों और प्रशासन को देना चाहिए।

जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों के कंधों पर है, उनकी कार्यप्रणाली से जुड़ी ऐसी घटनाओं पर पारदर्शिता जरूरी है। हालांकि, किसी अधिकारी द्वारा कथित हवाई फायर की घटना को अपने आप में कानून-व्यवस्था की विफलता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। घटना की परिस्थितियों, उपलब्ध साक्ष्यों और आधिकारिक जांच के आधार पर ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। फिर भी, जब प्रदेश में रासुका लागू हो और सरकार सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जता रही हो, तब ऐसी घटनाओं पर उठने वाले सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
नुआखाई पर्व पर सियासत

एक ओर छत्तीसगढ़ की आंतरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो दूसरी ओर राजनीतिक नुमाइंदे वोट बैंक की राजनीति में उलझे हैं। ओडिशा का पारंपरिक और पवित्र कृषि पर्व ‘नुआखाई’ अपने निर्धारित समय और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है। ऐसे में आरोप है कि कुछ स्वार्थी नेताओं और एक उड़िया विधायक के इशारों पर इसे तय समय से लगभग एक महीने बाद छत्तीसगढ़ में आयोजित कर सियासी लाभ लेने की कोशिश की गई। वहीं, प्रदेश के पारंपरिक तीज-त्योहारों के मुकाबले ‘बिहार तिहार’ को प्रमुखता दिए जाने पर भी सवाल उठते हैं। क्या राजनीतिक हितों के लिए छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय परंपराओं की अनदेखी जायज है ? छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और विभिन्न समुदायों की परंपराओं का सम्मान करते हुए यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है कि धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों को अनावश्यक राजनीतिक विवाद का माध्यम न बनाया जाए।
सुरक्षा के नाम पर कठोर कानून, लेकिन जवाबदेही कहां?
पूरे घटनाक्रम को एक साथ देखने पर छत्तीसगढ़ सरकार के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े होते हैं। रासुका लागू करने के पीछे वास्तविक सुरक्षा संबंधी आधार क्या हैं? राष्ट्रपति का दौरा सफलतापूर्वक संपन्न होने और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के राज्योत्सव में प्रस्तावित आगमन के बीच सरकार अपनी सुरक्षा नीति को किस तरह स्पष्ट करती है? रायपुर में पुलिस कमिश्नरेट लागू करने से आम नागरिकों को क्या ठोस लाभ मिला है? और राजनांदगांव में कथित हवाई फायर की घटना को लेकर प्रशासन का आधिकारिक पक्ष क्या है?
इन सवालों का जवाब केवल कठोर कानून लागू करने या पुलिस को अतिरिक्त अधिकार देने से नहीं मिलेगा। इसके लिए पारदर्शिता, प्रभावी प्रशासन, निष्पक्ष जांच और जनता के प्रति जवाबदेही जरूरी है। रासुका जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल कानून के अनुरूप और उसके निर्धारित उद्देश्य के तहत होना चाहिए; इसे आम नागरिकों में भय पैदा करने का माध्यम नहीं बनना चाहिए।
सरकार को यह भी स्पष्ट करना होगा कि राज्य में सुरक्षा संबंधी चिंताओं का आकलन किन तथ्यों के आधार पर किया गया है और पुलिस कमिश्नरेट जैसी प्रशासनिक व्यवस्था से कानून-व्यवस्था में क्या बदलाव आया है। यदि ये फैसले वास्तविक सुरक्षा सुधार के लिए हैं, तो उनके परिणाम भी जनता के सामने आने चाहिए।
लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही केवल विपक्ष के सवालों का जवाब देने तक सीमित नहीं होती। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके नाम पर कठोर कानून क्यों लागू किए जा रहे हैं, पुलिस को अतिरिक्त अधिकार देने की जरूरत क्यों पड़ी और इन कदमों से नागरिकों की सुरक्षा तथा अधिकारों को कितना लाभ मिला।
छत्तीसगढ़ सरकार के सामने असली चुनौती यही है कि वह सुरक्षा के दावों को जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों में बदले। कानून का सम्मान भय से नहीं, बल्कि निष्पक्ष कार्रवाई, प्रभावी प्रशासन और न्यायपूर्ण व्यवस्था से कायम होता है। यही कसौटी रासुका, पुलिस कमिश्नरेट और राज्य की संपूर्ण कानून-व्यवस्था पर भी लागू होनी चाहिए।


