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गुरूर के आदिवासी अंचलों में जमीनों के सौदों पर सवाल, हरे-भरे पेड़ों की कटाई से मचा हड़कंप।

आदिवासी जमीन गैर-आदिवासियों के नाम कैसे हुई रजिस्ट्री? बिना अनुमति वृक्षों की कटाई पर कब होगी कार्रवाई, जांच के घेरे में राजस्व विभाग की भूमिका!

गुरूर (बालोद) : तहसील गुरूर के अंदरूनी आदिवासी इलाकों में जमीनों की खरीदी-बिक्री और हरे-भरे पेड़ों की कथित अंधाधुंध कटाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप हैं कि बाहरी व्यक्ति क्षेत्र में जमीनों के सौदों में सक्रिय हैं और भोले-भाले आदिवासियों को अपने प्रभाव में लेकर उनकी जमीनों की खरीदी-बिक्री की जा रही है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह आदिवासी हितों, जमीन के वैधानिक हस्तांतरण और प्राकृतिक संपदा की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है।

आदिवासी जमीन गैर-आदिवासियों के नाम कैसे हुई रजिस्ट्री?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि संबंधित जमीन आदिवासी खातेदार की थी, तो उसके गैर-आदिवासी के नाम हस्तांतरण की रजिस्ट्री किन नियमों और परिस्थितियों में हुई? क्या जमीन की खरीदी-बिक्री के लिए आवश्यक वैधानिक अनुमति ली गई थी? क्या संबंधित दस्तावेजों का नियमानुसार सत्यापन किया गया? जमीन बेचने वाले आदिवासी परिवारों की क्या मजबूरी थी और उन्हें जमीन का उचित मूल्य मिला या नहीं?

इन सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। राजस्व अभिलेख, मूल स्वामित्व दस्तावेज, रजिस्ट्री के कागजात, नामांतरण की प्रक्रिया और संबंधित अनुमतियों की बारीकी से जांच की जानी चाहिए। साथ ही, यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि जमीन का वास्तविक मालिक कौन है और कहीं किसी प्रकार की धोखाधड़ी, दबाव या नियमों के उल्लंघन के जरिए तो जमीन का हस्तांतरण नहीं कराया गया। यदि अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो संबंधित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाए।

गुरूर में पेड़ों की कथित कटाई से जुड़े सवाल

मामला केवल जमीनों की खरीदी-बिक्री तक सीमित नहीं है। क्षेत्र में हरे-भरे पेड़ों की कथित अंधाधुंध कटाई को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि राजस्व विभाग की आवश्यक अनुमति के बिना वृक्षों को धड़ाधड़ काटकर धराशायी किया जा रहा है। यदि ऐसा हो रहा है, तो यह पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के प्रति गंभीर चिंता का विषय है।

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जंगल और पेड़-पौधे किसी की निजी जागीर नहीं हैं कि नियमों को ताक पर रखकर उन्हें काट दिया जाए। हालांकि, संबंधित भूमि की श्रेणी, वृक्षों के स्वामित्व और लागू नियमों की जांच के बाद ही कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। प्रशासन को मौके पर निरीक्षण कर कटे हुए पेड़ों की संख्या, भूमि के रिकॉर्ड और कटाई की अनुमति से संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल करनी चाहिए।

जमीन हस्तांतरण और वृक्ष कटाई में राजस्व विभाग की भूमिका

जब क्षेत्र में जमीनों के हस्तांतरण और पेड़ों की कटाई को लेकर इस तरह के आरोप सामने आ रहे हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है। क्या अधिकारियों को इन गतिविधियों की जानकारी है? यदि शिकायतें प्राप्त हुई हैं, तो अब तक क्या कार्रवाई की गई? क्या विभाग मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का पता लगाएगा या मामला केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रह जाएगा?

प्रशासन को चाहिए कि वह इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच टीम गठित करे। संबंधित गांवों में मौके का निरीक्षण किया जाए, आदिवासी परिवारों के बयान दर्ज किए जाएं तथा जमीनों के मूल दस्तावेजों, रजिस्ट्री और नामांतरण की वैधानिकता की जांच हो। पेड़ों की कटाई के मामले में भी संबंधित भूमि और आवश्यक अनुमतियों की जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए।

गुरूर में आदिवासी जमीन के मामले की जांच कब होगी?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गुरूर तहसील प्रशासन इन मामलों की जांच के लिए विशेष टीम गठित करेगा? क्या जमीनों की खरीदी-बिक्री और वृक्षों की कटाई से जुड़े दस्तावेज खंगाले जाएंगे? क्या संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका की जांच होगी? और यदि नियमों का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो कार्रवाई कब होगी?

आदिवासी परिवारों के जमीन संबंधी अधिकारों की रक्षा करना और प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान से बचाना प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसलिए जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और तथ्य आधारित होनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर दोषी ठहराने के बजाय दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की जानी चाहिए।

आदिवासी हितों की रक्षा और पर्यावरण संरक्षण पर नजर

गुरूर तहसील के अंदरूनी इलाकों से जुड़े इन सवालों का जवाब अब प्रशासनिक जांच और ठोस कार्रवाई से ही मिलेगा। यदि जमीनों के हस्तांतरण में नियमों का उल्लंघन हुआ है या बिना आवश्यक अनुमति पेड़ों की कटाई की गई है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, जांच में आरोप सही नहीं पाए जाने पर वास्तविक स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।

अब निगाहें राजस्व विभाग और जिला प्रशासन पर टिकी हैं। क्या जांच टीम गठित कर जमीनों की रजिस्ट्री से लेकर हरे-भरे पेड़ों की कटाई तक की पूरी पड़ताल होगी,या आदिवासी हितों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े ये सवाल जवाब की प्रतीक्षा करते रहेंगे?

Balod pratinidhi
अमीत मंडावी संवाददाता
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