वकालत की आड़ में हथियारों का रौब, 11 साल तक पुलिस बेखबर…?
क़ानूनी दांवपेंच का खिलाड़ी वकील, हथियारों वाली तस्वीरों के बीच 11 साल तक फेसबुक पर इतराता रहा; कानून का रखवाला कान में रुई ठूंसकर कुंभकर्णीय निद्रा में सोता रहा...!

अंबिकापुर (सरगुजा) hct : अधिवक्ता संजय अंबष्ठ से जुड़ी कुछ पुरानी फेसबुक तस्वीरों ने पुलिस की निगरानी और जांच व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। समाजसेवी अभय नारायण पांडेय ने सरगुजा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक को शिकायत सौंपकर अधिवक्ता संजय अंबष्ठ तथा उनके नाबालिग पुत्र से संबंधित फेसबुक पोस्ट और तस्वीरों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

शिकायत में वर्ष 2015 से 2018 के बीच की कई तस्वीरों का उल्लेख किया गया है, जिनमें अलग-अलग मौकों पर हथियार जैसी वस्तुएं दिखाई देने का दावा है। इनमें एक तस्वीर में राइफलनुमा हथियार, दूसरी में पिस्टल तथा बाद की एक तस्वीर में दूरबीन लगी लंबी बंदूक जैसी वस्तु दिखाई देने की बात कही गई है। एक अन्य तस्वीर में नाबालिग बच्चे के हाथ में लंबी बंदूक जैसी वस्तु और दूसरी में धारदार हथियार जैसी वस्तु होने का भी दावा किया गया है।
तस्वीरें स्पष्ट, अब हथियारों की वैधता जांच का सवाल

सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों में आरोपी के पास आग्नेयास्त्र दिखाई देने का दावा महज अफवाह के स्तर पर नहीं छोड़ा जा सकता। तस्वीरों में दिखाई दे रहे हथियारों की पहचान, उनका स्वामित्व, लाइसेंस और उन्हें रखने अथवा इस्तेमाल करने की वैधानिक अनुमति की जांच पुलिस के लिए अहम है।
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खास तौर पर जब तस्वीरें वर्षों पुरानी बताई जा रही हैं, तब यह पता लगाना जरूरी है कि संबंधित हथियार किसके नाम पर दर्ज थे, आरोपी के पास उनकी मौजूदगी किस अधिकार के तहत थी और सार्वजनिक रूप से ऐसी तस्वीरें सामने आने के बावजूद उस समय पुलिस ने कोई सत्यापन क्यों नहीं किया। मुद्दा यह नहीं कि तस्वीर में हथियार था या नहीं, बल्कि यह है कि यदि हथियार था तो वह वैध था या नहीं और कानून के रखवालों ने इतने वर्षों तक इसकी पड़ताल क्यों नहीं की।
बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभानअल्लाह!

शिकायत में केवल अधिवक्ता संजय अंबष्ठ की हथियारों वाली तस्वीरों का ही उल्लेख नहीं है, बल्कि एक तस्वीर ऐसी भी बताई गई है जिसमें उनके नाबालिग पुत्र के हाथ में लंबी बंदूकनुमा वस्तु दिखाई देती है। यदि तस्वीर में दिखाई दे रहा हथियार वास्तविक आग्नेयास्त्र है, तो मामला केवल हथियार रखने तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह भी जांच का विषय बनता है कि एक नाबालिग के हाथ तक वह हथियार पहुंचा कैसे और उसे इस तरह सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की परिस्थितियां क्या थीं। बड़े मियां के हाथ में हथियारों की तस्वीरों के बाद छोटे मियां के हाथ में भी हथियार जैसी तस्वीर सामने आने का दावा पुलिस के लिए महज सोशल मीडिया सामग्री नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम की कड़ियां जोड़कर देखने का विषय है। तस्वीर की तारीख, स्थान, हथियार की पहचान और उसके वास्तविक स्वामी से जुड़े रिकॉर्ड इस कड़ी को स्पष्ट कर सकते हैं।
संजय दत्त प्रकरण से समझिए हथियार की वैधता का महत्व
हथियारों के मामले में यह बात महत्वपूर्ण है कि किसी व्यक्ति की सार्वजनिक पहचान या पेशा उसे हथियार संबंधी कानूनों से अलग नहीं करता। अभिनेता संजय दत्त के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने अनधिकृत हथियार रखने से संबंधित Arms Act के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी थी। उस मामले में AK-56 राइफल, 9 एमएम पिस्तौल और गोलियों से संबंधित साक्ष्य न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा थे। हालांकि उन्हें आतंकवाद से जुड़े आरोपों में दोषी नहीं ठहराया गया था।
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यह उदाहरण केवल इस बात को रेखांकित करता है कि हथियार की वैधता, उसका कब्जा और उसका स्रोत अलग-अलग तथ्य हैं, जिनका प्रमाण के आधार पर परीक्षण किया जाता है। मौजूदा अंबष्ठ मामले में अभी तस्वीरों और शिकायत में किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।
11 साल तक पुलिस की नजर से कैसे बचीं तस्वीरें?
शिकायत में जिन तस्वीरों का उल्लेख है, उनमें कुछ वर्ष 2015 से 2018 के बीच की बताई गई हैं। यदि ये तस्वीरें संबंधित फेसबुक अकाउंट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थीं और उनमें आग्नेयास्त्र दिखाई दे रहे थे, तो इतने लंबे समय तक पुलिस, साइबर सेल अथवा संबंधित खुफिया तंत्र की नजर इन पर क्यों नहीं गई, यह अपने आप में जांच का विषय है। क्या सोशल मीडिया पर हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर निगरानी की कोई व्यवस्था थी और यदि थी, तो इन तस्वीरों पर कभी कोई संज्ञान लिया गया या नहीं? शिकायत सामने आने के बाद पुलिस को यह भी खंगालना होगा कि इन तस्वीरों के संबंध में पहले कभी कोई शिकायत, सूचना अथवा पुलिस रिकॉर्ड मौजूद था या नहीं। 11 साल पुराने इन पोस्टों का सच अब मूल डिजिटल सामग्री, उनके प्रकाशन की तारीख और उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड के मिलान से ही सामने आएगा।
