प्रेम ने चिकन पकाया, जिम्मेदार क्या पका रहे हैं ?
भाठागांव की "रेडी टू इट चिकन" दुकानों में खाली शराब की बोतलें और घरेलू गैस सिलेंडर, महज संयोग या फिर किसी अनदेखी कड़ी का संकेत?

रायपुर hct : सामने स्क्रीन पर आप जो वीडियो देख रहे हैं वह भाठागांव स्थित “प्रेम और गेंदू चिकन सेंटर” का है जो कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, काठाडीह मार्ग, आछी तालाब के आसपास संचालित इन दुकानों पर शाम ढलते ही बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। यहां ग्राहकों की पसंद के अनुसार चिकन-मटन पकाकर परोसने का व्यवसाय लंबे समय से संचालित हो रहा है। लेकिन…
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वायरल हो रहे वीडियो में एक कोने में बड़ी संख्या में खाली शराब की बोतलें दिखाई दे रही हैं। यदि यह प्रतिष्ठान केवल भोजन परोसने का कार्य करता है, तो इतनी मात्रा में शराब की बोतलों की मौजूदगी स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा पैदा करती है। इसके अलावा वीडियो में घरेलू गैस सिलेंडर भी दिखाई दे रहा है। यदि उसका उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों में किया जा रहा है, तो यह भी जांच का विषय बनता है, यदि इन परिस्थितियों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई है, तो संबंधित विभागों से सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रेम चिकन सेंटर वीडियो विवाद आखिर जवाब देगा कौन?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आबकारी विभाग, स्थानीय पुलिस और नगर निगम जैसे संबंधित विभागों से है। क्या इन प्रतिष्ठानों का नियमित निरीक्षण किया जाता है ? क्या मौके पर दिखाई देने वाली परिस्थितियों की कभी जांच हुई है ? क्या वीडियो में दिखाई दे रही सामग्री की सत्यता का परीक्षण किया गया ? और यदि नहीं, तो क्यों ?

यह खबर किसी व्यक्ति, व्यवसायी या अधिकारी को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने रखने के लिए है जो यक्ष प्रश्न बनकर समाज के सामने खड़े हैं। बस हमारे खबर का मूल मुद्दा यह है कि जब यह दुकान शराब परोसने के लिए अधिकृत नहीं है, तो परिसर में इतनी बड़ी संख्या में शराब की बोतलें कैसे पहुंचीं ? क्या घरेलू गैस सिलेंडर का व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है? यदि हां, तो संबंधित विभाग ने अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की?
व्यापार बढ़ा, लेकिन शंकाएं भी बढ़ीं
कुछ वर्ष पहले तक यह कारोबार छोटे किराए के कमरों तक सीमित था। मेहनत, ग्राहकों की बढ़ती संख्या और व्यापारिक विस्तार के साथ इन दुकानों का स्वरूप भी बदलता गया। जो दुकानें कभी सीमित दायरे में संचालित होती थीं, वे आज बड़े व्यावसायिक परिसरों में तब्दील होती दिखाई देती हैं। व्यापार बढ़ना अपने आप में कोई अपराध नहीं है और न ही किसी की सफलता पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा सकता है, मगर सवाल तब खड़े होते हैं जब मौके पर दिखाई देने वाली परिस्थितियां कई शंकाओं को जन्म देने लगती हैं।
जिम्मेदार विभागों की निगरानी पर प्रश्न
प्रेम के इस मोहमाया में आबकारी अधिकारी टेक बहादुर कुर्रे आखिर क्यों गांधारी की भांति आंखों पर पट्टी बांधे हुए प्रतीत हो रहे हैं ? और क्या कमिश्नर साहब को भी इस अवैधानिक कृत्य से अनभिज्ञ रखकर उनके मातहत की कार्रवाई भी टांय–टांय फिस्स नजर आ रही है…?


