Chhattisgarh

संवाद में “फर्जी प्रकाशन विशेषज्ञ” पर गिरी गाज

25 साल पुरानी विवादित नियुक्ति पर आखिरकार कार्रवाई, 21 अप्रैल 2026 को पद से हटाया गया

फर्जी प्रकाशन विशेषज्ञ पर कार्रवाई

रायपुर hct : “फर्जी प्रकाशन विशेषज्ञ संवाद” का मामला आखिरकार कार्रवाई तक पहुंच गया है। छत्तीसगढ़ संवाद में वर्षों से पदस्थ सव्यसाची कर को 21 अप्रैल 2026 को उनके पद से हटा दिया गया है। दरअसल, सूचना के अधिकार के तहत सामने आए तथ्यों और लगातार उठ रहे सवालों के बाद यह कदम उठाया गया। दरअसल, यह पूरी कार्रवाई आरटीआई एवं सामाजिक कार्यकर्ता आशीष देव सोनी द्वारा दिनांक 09/04/2026 को की गई शिकायत के बाद शुरू हुई प्रक्रिया का नतीजा मानी जा रही है, जिसने इस लंबे समय से दबे मामले को फिर से केंद्र में ला दिया।फर्जी प्रकाशन विशेषज्ञ सव्यसाची कर के खिलाफ 09/04/2026 की शिकायत पत्र की प्रति

वहीं, मुख्य कार्यपालन अधिकारी रजत बंसल द्वारा की गई यह कार्रवाई लंबे समय से लंबित मामले में प्रशासनिक सक्रियता का संकेत मानी जा रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन गड़बड़ियों की जानकारी वर्षों पहले सामने आ चुकी थी, उन पर कार्रवाई करने में इतना लंबा वक्त आखिर क्यों लगा?

फर्जी विशेषज्ञ संवाद में प्रमाण पत्रों की गड़बड़ी

इस पूरे मामले की जड़ में वह आरोप रहा, जिसमें “प्रकाशन विशेषज्ञ” सव्यसाची कर पर फर्जी प्रमाण पत्रों के सहारे प्रकाशन विशेषज्ञ की नौकरी हासिल करने का आरोप लगा। जांच में यह बात सामने आई कि उनके पास प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी में आवश्यक डिग्री या डिप्लोमा नहीं है, जबकि नियुक्ति की शर्तों में यह अनिवार्य था। इसके अलावा, उनके द्वारा प्रस्तुत अनुभव प्रमाण पत्र भी संदेह के घेरे में पाए गए। दरअसल, जांच में सामने आए तथ्यों ने केवल एक नियुक्ति पर नहीं, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए थे।

इसे भी पढ़े >> सवांद में “प्रकाशन विशेषज्ञ” की नियुक्ति का फर्जीवाड़ा।

जांच हुई, लेकिन फाइलें दबती रहीं

वर्ष 2013 में गठित जांच समिति ने कई विसंगतियों की पुष्टि की थी। हालांकि, इसके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई। वहीं, सव्यसाची कर द्वारा उच्च न्यायालय में लंबित याचिका का हवाला देकर जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश भी सामने आई। लेकिन तथ्य यह रहा कि न्यायालय ने विभागीय जांच पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई थी। इसके बाद भी वर्षों तक मामला जस का तस बना रहा। हालांकि, हालिया दौर में विभागीय स्तर पर निर्णय लेने की गति तेज हुई है, जिससे संकेत मिलता है कि अब पुराने मामलों को भी प्राथमिकता में लिया जा रहा है। फाइलों में दर्ज सच और जमीन पर दिखती चुप्पी के बीच का यह फर्क अब सवालों के घेरे में है।

जाँच समिति से जुड़े दस्तावेज यहाँ देखें

अब हटाए गए, आगे क्या होगा?

अब जब सव्यसाची कर को पद से हटा दिया गया है, तो यह केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई भर नहीं मानी जा रही। बल्कि यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है, जहां फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी हासिल करने वाला व्यक्ति वर्षों तक पद पर बना रहा। साथ ही, शिकायत में यह भी मांग उठ रही है कि इस पूरे मामले में आपराधिक प्रकरण दर्ज कर वसूली की कार्रवाई की जाए। वहीं, सूत्रों और शिकायतों में सामने आए नामों में संजीव तिवारी जैसे मामलों को लेकर भी सख्त कार्रवाई की मांग उठती नजर आ रही है। अब यह मुद्दा केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि ऐसे ही भ्रष्ट आचरण के आरोपों में कुर्सियों से चिपके अन्य मामलों की भी चर्चा तेज हो गई है।

कार्रवाई का दायरा बढ़ेगा या यहीं थमेगा?

इस कार्रवाई के बाद अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह कदम सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित रहेगा या फिर उन जिम्मेदार अधिकारियों तक भी पहुंचेगा, जिनकी निगरानी में यह पूरा मामला वर्षों तक दबा रहा। हालांकि, इस घटनाक्रम ने यह जरूर दिखाया है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो लंबित मामलों में भी ठोस निर्णय संभव हैं। अब देखने वाली बात यह होगी कि यह कार्रवाई केवल एक नाम तक सीमित रहती है या फिर उन तमाम चेहरों तक भी पहुंचती है, जिनके नाम फाइलों में दबे हुए हैं, लेकिन चर्चा में लगातार तैर रहे हैं।

telegram link

Back to top button