तपती दोपहर में पौधरोपण, धनौरा पंचायत की कार्यशैली पर बहस
बालोद के गुरूर ब्लॉक की धनौरा पंचायत में 40° तापमान के बीच पथरीली राजस्व जमीन पर रोपे गए पौधे, ग्रामीणों के बीच बना यक्ष प्रश्न

तपती दोपहर का अजीब दृश्य

बालोद जिले के गुरूर ब्लॉक की धनौरा पंचायत इन दिनों चौंका देने वाले कार्यकलापों के चलते चर्चा में है। वजह जानकर आपका दिमाग भी कुछ पल के लिए ठिठक सकता है। भीषण गर्मी, पसीने से तरबतर मजदूर और तपती दोपहर—यही दृश्य उस समय दिखा, जब कुछ राहगीरों की निगाहें बटालियन के पास की पथरीली राजस्व जमीन पर पौधरोपण करते मजदूरों पर जा टिकीं। मार्च का महीना है, और इस बार तापमान 40 डिग्री तक पहुँच चुका है। हवा में ऐसी तपिश है कि छांव ढूँढना भी मुश्किल हो रहा है।
जब पौधों के भविष्य पर उठने लगा यक्ष प्रश्न
दरअसल, जब आसपास के खेतों में काम करने वाले लोग खुद तेज धूप से बचने के लिए छांव तलाशते नजर आते हैं, उसी समय मजदूरों से पौधरोपण कराना गांव के लोगों को हैरान कर रहा है।
इतनी तपिश में जहाँ इंसान का खड़ा रहना ही दूभर हो, ऐसे मौसम में लगाए गए पौधों के जीवित रहने की संभावना कितनी होगी – यही सवाल अब लोगों के बीच यक्ष प्रश्न बन गया है। यही वजह है कि यह पूरा घटनाक्रम केवल वृक्षारोपण तक सीमित न रहकर इसके पीछे के उद्देश्य पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
मौसम की समझ या नासमझी का मौसम?
अमूमन वृक्षारोपण का सही समय बारिश का मौसम ही माना जाता है, ताकि पौधों को पर्याप्त पानी और नमी मिल सके। लेकिन धनौरा पंचायत ने मानो इस सामान्य समझ को ही चुनौती दे दी है। भरी गर्मी में पौधरोपण कर एक तरह से नया “वैज्ञानिक चमत्कार” पेश कर दिया गया है।
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बजट खर्च की जल्दी या कागजी हरियाली
वैसे स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि इतनी भीषण गर्मी में पौधे लगाने के पीछे तर्क कहीं यह तो नहीं कि किसी योजना के बजट को जल्द खर्च दिखाया जाए, या फिर कागजों में काम पूरा दर्शाने की जल्दी हो। यदि ऐसा है, तो इसे केवल संयोग मान लेना भी आसान नहीं होगा।

