पुलिस की सक्रियता, आबकारी विभाग की निष्क्रियता बेनकाब !
रायपुर में 105 पौवा शराब जब्ती के बाद उठा बड़ा सवाल, जब अलग आबकारी अमला है तो हर बड़ी कार्रवाई पुलिस की सक्रियता क्यों सामने आती है !

आबकारी बनाम पुलिस विभाग की बहस एक बार फिर रायपुर में अवैध शराब की कार्रवाई के बाद तेज हो गई है। शासन व्यवस्था में दोनों विभागों की जिम्मेदारियां अलग-अलग निर्धारित हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर कुछ और दिखाई देती है। प्रशासनिक व्यवस्था में हर विभाग का गठन एक निश्चित उद्देश्य और विशेषज्ञता के आधार पर किया जाता है। हत्या, लूट, संगठित अपराध और अंतरराज्यीय गिरोहों की निगरानी के लिए पुलिस विभाग के भीतर क्राइम ब्रांच, एंटी क्राइम एंड साइबर यूनिट तथा एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स जैसी विशेष इकाइयां बनाई गई हैं।
ठीक उसी तरह अवैध शराब के निर्माण, परिवहन, भंडारण और बिक्री पर नियंत्रण के लिए अलग से आबकारी विभाग अस्तित्व में है। राज्य सरकार इस विभाग के संचालन पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च करती है, उसका अपना अमला और वैधानिक अधिकार भी हैं। ऐसे में जब अवैध शराब के खिलाफ लगभग हर बड़ी कार्रवाई पुलिस के खाते में दर्ज होती दिखाई दे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर आबकारी विभाग की जमीनी भूमिका कितनी प्रभावी है।
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राजधानी hct : रायपुर के डी.डी. नगर थाना क्षेत्र में शुक्रवार को सामने आया एक मामला इसी बहस को और गहरा कर गया। सरोना स्थित शक्ति घाट के पास अवैध शराब बिक्री की सूचना पर एंटी क्राइम एंड साइबर यूनिट, एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स और डी.डी. नगर थाना पुलिस की संयुक्त टीम ने दबिश देकर 24 वर्षीय नेहा कण्डरा को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार उसके कब्जे से 105 पौवा देशी शराब बरामद हुई, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 10,500 रुपये है।
लापरवाह आबकारी अधिकारी !
पुलिसिया पूछताछ के दौरान महिला कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकी और कथित तौर पर जांच दल को गुमराह करने का प्रयास भी करती रही। इसके बाद पुलिस ने आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी। बता दें कि इस सर्कल की आबकारी अधिकारी एक महिला है जिनके कर्तव्य के प्रति अक्सर लापरवाही उजागर होते आया है।
आबकारी बनाम पुलिस विभाग : सवाल यहीं से खड़ा होता है
कानूनी रूप से पुलिस को भी आबकारी अधिनियम के तहत कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है और सूचना मिलने पर वह तत्काल छापेमारी कर सकती है। लेकिन यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस कार्रवाई में क्राइम इंटेलिजेंस से लेकर थाना पुलिस तक कई इकाइयां सक्रिय रहीं, जबकि जिस विभाग का मूल दायित्व अवैध शराब के कारोबार पर निगरानी रखना माना जाता है, उसकी भूमिका सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई। यही कारण है कि हर बड़ी जब्ती के बाद यह चर्चा तेज हो जाती है कि क्या आबकारी विभाग अपनी प्रवर्तन (Enforcement) जिम्मेदारियों को अपेक्षित सक्रियता से निभा पा रहा है।
जिम्मेदारी का संतुलन बदल रहा है क्या?
आबकारी विभाग का कार्य केवल लाइसेंस जारी करना या राजस्व संग्रह तक सीमित नहीं है। उसकी जिम्मेदारी अवैध शराब निर्माण, भंडारण, परिवहन और बिक्री पर नियंत्रण रखना तथा तस्करी के नेटवर्क पर निगरानी बनाए रखना भी है। दूसरी ओर पुलिस पहले से ही हत्या, चोरी, साइबर अपराध, कानून-व्यवस्था, ट्रैफिक और वीआईपी ड्यूटी जैसी अनेक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रही है। यदि इन सबके बीच अवैध शराब के खिलाफ भी सबसे अधिक सक्रियता पुलिस की ओर से दिखाई देती है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था में जिम्मेदारियों के वास्तविक वितरण पर सवाल खड़े करता है।
105 पौवा शराब से बड़ा मुद्दा व्यवस्था का
रायपुर की यह कार्रवाई निश्चित रूप से पुलिस की मुस्तैदी और त्वरित प्रतिक्रिया का उदाहरण है। लेकिन इसके साथ यह एक बड़ा प्रशासनिक प्रश्न भी छोड़ जाती है। जब अवैध शराब के खिलाफ विशेष विभाग मौजूद है, तब हर बड़ी सफलता पुलिस की फाइलों में ही क्यों दर्ज हो रही है? क्या विभागों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है, या फिर यह संकेत है कि मैदान में जिम्मेदारियों का संतुलन धीरे-धीरे बदल चुका है? फिलहाल 105 पौवा देशी शराब की बरामदगी से कहीं बड़ा सवाल यही बनकर उभर रहा है कि व्यवस्था में तय दायित्वों का वास्तविक निर्वहन आखिर किसके हिस्से में आ रहा है।


