पीड़ित को सुप्रीम कोर्ट से मिली बेल, अब जान जाने का डर ! मंदिर हसौद थाना बेफिकर
खेमन लाल साहू प्रकरण में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल, परिवार ने पुलिस अधीक्षक से लगाई सुरक्षा की गुहार

रायपुर hct : खेमन लाल साहू प्रकरण मंदिर हसौद थाना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। परिवार का आरोप है कि घटना से संबंधित CCTV फुटेज और दर्ज धाराओं के बावजूद चार नामजद आरोपियों के विरुद्ध अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है। मामले में लोकनाथ साहू, निशा साहू, नागेश साहू और रोशन पारधी के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 333, 296, 115(2), 351(2) तथा 3(5) के तहत प्रकरण दर्ज है। परिवार का दावा है कि घटना से संबंधित CCTV फुटेज पुलिस के पास उपलब्ध है, इसके बावजूद आरोपितों के विरुद्ध अपेक्षित कार्रवाई आगे नहीं बढ़ रही है।
परिजनों का आरोप है कि पुलिस की इस कथित निष्क्रियता से आरोपित पक्ष का मनोबल बढ़ रहा है और पीड़ित परिवार स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहा है। खेमन लाल साहू की पुत्री भावना साहू ने पुलिस अधीक्षक के समक्ष आवेदन देकर परिवार की सुरक्षा की मांग की है। आवेदन में परिवार को जान का खतरा होने तथा हत्या जैसी आशंका का उल्लेख किए जाने की बात कही गई है।
खेमन लाल साहू प्रकरण को लेकर पुलिस की भूमिका इसलिए भी सवालों के घेरे में है क्योंकि शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से दर्ज मामले में खेमन लाल साहू को छेड़छाड़ के आरोप में गिरफ़्तारी की बात सामने आ रही थी। जिसके परिप्रेक्ष्य में परिवार के अनुसार, अग्रिम जमानत उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से ले रखी है। हालांकि इस जमानत का अर्थ आरोपों से अंतिम रूप से दोषमुक्त होना नहीं है; यह न्यायालय द्वारा मामले की सुनवाई के दौरान पारित आदेश का विषय है।
खेमन लाल साहू प्रकरण कार्रवाई के दो पैमाने?
खेमन लाल साहू प्रकरण का मूल सवाल यही है कि यदि एक पक्ष की शिकायत पर पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए खेमन लाल साहू के विरुद्ध गैर जमानती धारा के तहत कार्रवाई किया गया, तो दूसरे पक्ष के विरुद्ध दर्ज धाराओं और उपलब्ध बताए जा रहे CCTV फुटेज पर कार्रवाई की गति इतनी धीमी क्यों है?
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BNS की धारा 115(2) स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाने से संबंधित है, जबकि 351(2) आपराधिक धमकी से संबंधित प्रावधान है। धारा 3(5) सामान्य आशय के साथ किए गए अपराध में संयुक्त दायित्व से जुड़ी है। इन प्रावधानों का वास्तविक अनुप्रयोग घटना के तथ्य और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।

धारा 115(2) और 351(2) के अपराधों के संबंध में BNSS की धारा 359 में समझौते की व्यवस्था भी अलग-अलग परिस्थितियों में दी गई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पुलिस उपलब्ध साक्ष्यों की जांच किए बिना मामले को समाप्त कर सकती है; जांच और न्यायिक प्रक्रिया अपने निर्धारित तरीके से चलती है।
CCTV फुटेज की जांच हुई या सिर्फ फाइल में रखी है?
इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम सवाल CCTV फुटेज को लेकर है। यदि घटना का दृश्य रिकॉर्ड पुलिस के पास उपलब्ध है, तो उसकी जांच, सुरक्षित अभिरक्षा, आवश्यक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की प्रक्रिया और घटना में प्रत्येक व्यक्ति की कथित भूमिका का परीक्षण जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
यही वह बिंदु है जहां मंदिर हसौद पुलिस की कार्यप्रणाली पर परिवार सवाल उठा रहा है। क्या CCTV फुटेज का विधिवत परीक्षण किया गया? क्या फुटेज से आरोपित व्यक्तियों की भूमिका स्पष्ट होती है? क्या उनके बयान लिए गए? क्या मेडिकल और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों से उसका मिलान किया गया? और यदि कार्रवाई नहीं की गई तो उसका कारण क्या है? इन सवालों का स्पष्ट जवाब पुलिस की ओर से सामने आना बाकी है।
परिवार को सुरक्षा का डर, पुलिस के सामने चुनौती
परिजनों के द्वारा पुलिस अधीक्षक से परिवार की सुरक्षा की गुहार लगाए जाने के बाद मामला केवल पुराने विवाद तक सीमित नहीं रह जाता। यदि किसी परिवार द्वारा लिखित रूप से जान का खतरा जताया गया है, तो सुरक्षा संबंधी शिकायत पर पुलिस द्वारा जोखिम का आकलन और आवश्यक वैधानिक कार्रवाई किए जाने की अपेक्षा रहती है।
यहां सवाल किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करने का नहीं, बल्कि कानून के समान और निष्पक्ष अनुपालन का है। यदि CCTV और अन्य साक्ष्य आरोपों की पुष्टि करते हैं तो जांच के दौरान उनकी भूमिका कानून के अनुसार तय होनी चाहिए; और यदि साक्ष्य आरोपों की पुष्टि नहीं करते तो पुलिस को उसका कारण भी रिकॉर्ड पर स्पष्ट करना चाहिए।
मंदिर हसौद थाना पुलिस से इस मामले में यह सवाल सीधे पूछा जाना जरूरी है—जब मामला दर्ज है, CCTV फुटेज उपलब्ध होने की बात कही जा रही है और पीड़ित परिवार सुरक्षा की गुहार लगा रहा है, तो चारों नामजद व्यक्तियों के संबंध में अब तक की गई कार्रवाई क्या है? यही जवाब इस मामले में पुलिस की निष्पक्षता और जांच की दिशा को स्पष्ट करेगा।

