रायपुर hct : राजधानी रायपुर के भाठागांव के पास अन्तर्राजीय बस स्थानक क्या बन गया यहाँ जमीन का भाव आसमान छूने लगा है। वैसे भी जोन क्रमांक 6 के तहत भाठागांव और उसके आसपास भू-माफियाओं का राज आ गया है। भाठागांव स्थित केसरी बगीचा के पास जहाँ करीब सालभर पहले वार्ड नेता के भाई ने अवैध प्लाटिंग को अंजाम दिया था, उसी अवैध प्लाटिंग में अमित अग्रवाल की स्वामित्व वाली भूमि खसरा नम्बरो 1360/1, 1366/1 और 1367/3 से जुडी जमीन पर एक कथित बड़ा भूमाफिया अविनाश सोनकर उर्फ़ मोंटी द्वारा निगम के कर्णधारों से गुपचुप सांठगांठ कर दोबारा प्लॉटिंग करने और उक्त जमीन के विभिन्न हिस्सों की गुपचुप रजिस्ट्री किए जाने की खबर प्रकाशन के बावजूद उक्त स्थल पर अभी तक निगम के द्वारा किसी भी प्रकार की कार्रवाई का ना होना इस बात का संकेत करता है कि मामला साधारण से कहीं आगे बढ़कर है। इसे भी पढ़ें >> भाठागांव अवैध प्लॉटिंग, कार्रवाई के बाद आया मामले में नया मोड़ ... दिया तले अँधेरा वहीं दूसरी तरफ एक स्थानीय छुटभैया नेता के भाई धन्नू सोनकर का नाम भी इन्हीं भू माफियाओं में शामिल है। बता दें कि इस छुटभैए नेता को दूसरे बिल्डरों द्वारा किए जाने वाला प्लॉटिंग अवैध नजर आता है। यहाँ भी निगम की कार्रवाई टांय - टांय फिस्स ही रहा है ! रावतपुरा फेस II पर निर्माणाधीन मकान को लेकर निगम आयुक्त हितेंद्र यादव ने जहाँ तीन बार नोटिस देकर अपने कर्तव्यों का इतिश्री समझ कर हाथ पर हाथ घरे बैठे हैं वहीं अब एक और दान की भूमि पर अवैध प्लॉटिंग को लेकर एक नया नाम उजागर हुआ है। इसे भी पढ़ें >> छाया पार्षद का कमाल, निगम का हाल; बेहाल ! दानपत्र से नामांतरण, बटांकन और फिर प्लॉटिंग का रास्ता? अवैध प्लॉटिंग : रायपुर शहर से लगे इलाकों में जमीन के बढ़ते कारोबार के बीच अब एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें पारिवारिक दानपत्र के आधार पर नामांतरण और खसरा विभाजन यानी बटांकन के बाद कृषि भूमि के छोटे-छोटे हिस्से किए जाने के आरोप हैं। उपलब्ध राजस्व दस्तावेजों के अनुसार विभिन्न खसरा नंबरों का बटांकन हुआ और अलग-अलग व्यक्तियों के नाम पर भूमि दर्ज की गई। इसके बाद इन जमीनों पर आवासीय अथवा व्यावसायिक उपयोग के लिए प्लॉट काटे जाने की शिकायत सामने आई है। मामले में किरण साहू का नाम सामने आया है। आरोप है कि संबंधित कृषि भूमि पर आवश्यक वैधानिक अनुमतियां लिए बिना छोटे-छोटे भूखंड तैयार कर बिक्री की जा रही है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि दानपत्र और बटांकन स्वयं अवैध प्लॉटिंग का प्रमाण नहीं हैं। असली सवाल बटांकन के बाद भूमि के वास्तविक उपयोग और उस उपयोग के लिए ली गई अनुमतियों का है। राजस्व रिकॉर्ड में जमीन, मौके पर प्लॉट दस्तावेजों में जिन खसरों का विवरण सामने आता है, वे मूल कृषि भूमि से विभाजित होकर अलग-अलग उपखसरों के रूप में दर्ज हैं।राजस्व अभिलेखों के अनुसार दानपत्र के आधार पर नामांतरण एवं बटांकन से संबंधित भूमि इस प्रकार दर्ज है - ये सभी विवरण उस राजस्व रिकॉर्ड की ओर इशारा करते हैं जिसमें मूल खसरों के विभाजन के बाद अलग-अलग उपखसरे अस्तित्व में आए। बटांकन हुआ, लेकिन क्या भूमि का उपयोग भी बदल गया? यही बिंदु इस पूरे मामले को गंभीर बनाता है। कृषि भूमि का बटांकन होना और कृषि भूमि का आवासीय कॉलोनी में बदल जाना एक ही प्रक्रिया नहीं है। यदि बटांकन के बाद जमीन पर खेती के बजाय प्लॉट काटकर आवासीय या व्यावसायिक भूखंड के रूप में बिक्री की जा रही है, तो संबंधित भूमि के व्यपवर्तन और विकास संबंधी स्वीकृतियों की स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। इस मामले में दस्तावेजों के आधार पर यह जांच का विषय है कि संबंधित खसरों के लिए - कृषि से गैर-कृषि उपयोग का व्यपवर्तन हुआ या नहीं। नगर तथा ग्राम निवेश विभाग से आवश्यक लेआउट स्वीकृति ली गई या नहीं। संबंधित निकाय से कॉलोनी विकास अथवा विकास अनुमति प्राप्त की गई या नहीं। भूमि के टुकड़े बेचने की गतिविधि के लिए आवश्यक वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी की गईं या नहीं। मौके पर विकसित सड़क, रास्ते, भूखंडों की सीमाएं और अन्य निर्माण किस अनुमति के आधार पर किए गए। दानपत्र की जमीन पर कारोबार का नया चेहरा पारिवारिक दानपत्र किसी व्यक्ति को जमीन का वैध हस्तांतरण करने का माध्यम हो सकता है। उसके आधार पर नामांतरण और राजस्व रिकॉर्ड में आवश्यक प्रविष्टियां भी हो सकती हैं। लेकिन दानपत्र के बाद हुआ बटांकन जमीन को अपने आप कॉलोनी में बदलने की अनुमति नहीं देता। यही अंतर इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति को कृषि भूमि दान में मिली, उसका नामांतरण हुआ और बाद में राजस्व रिकॉर्ड में बटांकन दर्ज हुआ, तो इसके बाद उस जमीन को प्लॉटों में काटकर बाजार में उतारने के लिए अलग से लागू भूमि उपयोग एवं विकास संबंधी नियमों का पालन आवश्यक होगा। इसलिए दस्तावेजों की श्रृंखला केवल यहीं समाप्त नहीं होती - दानपत्र → नामांतरण → बटांकन → भूमि उपयोग → विकास अनुमति → लेआउट → प्लॉट बिक्री इस पूरी कड़ी की जांच किए बिना केवल बटांकन को आधार बनाकर जमीन की बिक्री को वैध नहीं माना जा सकता। कई खसरे, कई नाम और एक ही सवाल अवैध प्लॉटिंग : खसरा नंबर 933, 934, 937, 938 और 939 के विभिन्न उपभागों का रिकॉर्ड इस मामले को और महत्वपूर्ण बनाता है। अलग-अलग नामों पर दर्ज जमीन और उसके बाद होने वाली कथित प्लॉटिंग के बीच वास्तविक संबंध क्या है, यह राजस्व रिकॉर्ड और मौके के निरीक्षण से आसानी से स्पष्ट किया जा सकता है। यदि रिकॉर्ड में जमीन कृषि है और मौके पर आवासीय प्लॉट विकसित किए जा रहे हैं, तो दोनों स्थितियों के बीच आवश्यक वैधानिक कड़ी का रिकॉर्ड भी मौजूद होना चाहिए। वह कड़ी कहां है? यही सवाल संबंधित दस्तावेजों की जांच की मांग करता है। खरीदारों को सिर्फ रजिस्ट्री देखकर फैसला नहीं करना चाहिए किसी जमीन की रजिस्ट्री हो जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि जमीन वैध रूप से विकसित आवासीय कॉलोनी का हिस्सा है। संभावित खरीदार के लिए यह जानना जरूरी है कि - भूमि का वर्तमान मद क्या है? डायवर्सन आदेश है या नहीं? लेआउट स्वीकृत है या नहीं? कॉलोनी विकास की अनुमति है या नहीं? जिस प्लॉट की बिक्री हो रही है, वह स्वीकृत लेआउट में मौजूद है या केवल मौके पर बनाई गई सीमा के आधार पर बेचा जा रहा है? इन सवालों के जवाब भविष्य के विवाद से बचने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। प्रशासनिक रिकॉर्ड से खुल सकता है पूरा खेल इस मामले में जांच किसी बयान या आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि दस्तावेजों के आधार पर की जा सकती है। राजस्व विभाग से दानपत्र, नामांतरण और बटांकन की नस्ती निकाली जाए। नगर तथा ग्राम निवेश विभाग से संबंधित भूमि का लेआउट और विकास अनुमति जांची जाए। संबंधित नगर निगम से निर्माण अथवा कॉलोनी संबंधी अनुमति का रिकॉर्ड लिया जाए। भूमि का वर्तमान राजस्व मद और मौके का वास्तविक उपयोग मिलाया जाए। रजिस्ट्री कार्यालय के रिकॉर्ड से यह भी पता लगाया जा सकता है कि संबंधित खसरों से निकले हिस्सों की बिक्री कब-कब और किसके द्वारा की गई। इन रिकॉर्डों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट हो सकता है कि बटांकन केवल पारिवारिक भूमि व्यवस्था तक सीमित रहा या उसके बाद उसी भूमि को व्यावसायिक प्लॉटिंग के लिए इस्तेमाल किया गया।