फर्जी पोर्टलों से घिरती पत्रकारिता
फर्जी वेब पोर्टलों ने पत्रकारिता की साख पर खड़े किए सवाल, नियंत्रण को लेकर उठने लगी सख्त कार्रवाई की मांग

प्रदेश में वेब पोर्टल और यूट्यूब चैनलों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी है, उसने पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि महज दो से पांच हजार रुपये खर्च कर डोमेन खरीदना, सोशल मीडिया पेज बनाना और स्वयं को “प्रधान सम्पादक” घोषित कर देना बेहद आसान हो चुका है।
मीडिया जगत के भीतर अब उस प्रवृत्ति को लेकर भी चिंता बढ़ रही है जिसमें बिना किसी पत्रकारिता प्रशिक्षण, संपादकीय अनुभव या तथ्यात्मक समझ के लोग स्वयं को पत्रकार और संपादक घोषित कर रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति को आसान जरूर बनाया, लेकिन इसके साथ “डोमेन पत्रकारिता” का एक नया दौर भी खड़ा हो गया है।
नियम मौजूद, मगर पालन ?
Press Council of India द्वारा जारी Norms of Journalistic Conduct में स्पष्ट उल्लेख है कि समाचार का प्रकाशन तथ्यों की पुष्टि, निष्पक्षता और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए। किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ अपुष्ट अथवा दुर्भावनापूर्ण सामग्री का प्रसारण पत्रकारिता की मर्यादा के विरुद्ध माना गया है।
इसी प्रकार Ministry of Information and Broadcasting द्वारा लागू Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 के अंतर्गत डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म्स को आचार संहिता और शिकायत निवारण व्यवस्था सुनिश्चित करने की बात कही गई है। इसके बावजूद प्रदेश में कई छोटे और अपंजीकृत पोर्टल बिना किसी स्पष्ट संपादकीय ढांचे के सक्रिय बताए जाते हैं।
मीडिया से जुड़े लोगों का कहना है कि नियमों की मौजूदगी के बावजूद जमीनी स्तर पर निगरानी और जवाबदेही का अभाव साफ दिखाई देता है। यही कारण है कि डिजिटल माध्यमों में तथ्यात्मक शुद्धता और जिम्मेदार पत्रकारिता को लेकर बहस लगातार तेज हो रही है।
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शहर से कस्बों तक फैलता पत्रकारिता का खरपरवार
राजधानी रायपुर समेत प्रदेश के कई जिलों में सोशल मीडिया आधारित पत्रकारिता को लेकर चर्चाएं तेज हुई हैं। कुछ चर्चित यूट्यूब चैनलों और वेब पोर्टलों की कार्यशैली पर मीडिया जगत के भीतर भी सवाल उठते रहे हैं। पत्रकारों का कहना है कि कैमरा और मोबाइल हाथ में आते ही स्वयं को पत्रकार घोषित कर देने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।
मीडिया हलकों में चर्चित यूट्यूबर सोमा देवांगन जैसे मामलों का जिक्र करते हुए कई वरिष्ठ पत्रकार यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि समय रहते डिजिटल मीडिया के लिए स्पष्ट मानक और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो तहसील, जनपद और ग्राम पंचायत स्तर तक “स्वघोषित पत्रकारिता” का फैलाव और तेज हो सकता है।
मामूली घटनाओं को सनसनीखेज शीर्षकों के साथ पेश करना, बिना आधिकारिक पक्ष लिए आरोपों का प्रसारण करना और सोशल मीडिया व्यूज के लिए विवादास्पद सामग्री परोसना अब आम शिकायत बनती जा रही है। इससे वास्तविक पत्रकारिता और वायरल संस्कृति के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती दिखाई दे रही है।
कार्रवाई नहीं हुई तो बढ़ेगी अराजकता
पत्रकारों के एक वर्ग का मानना है कि राज्य सरकार, जनसंपर्क संचालनालय और जिला प्रशासन को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की गतिविधियों पर अधिक गंभीर निगरानी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। जिला स्तर पर संचालित पोर्टलों की खबरों पर नजर रखते हुए तथ्यात्मक रूप से भ्रामक अथवा अपुष्ट सामग्री के प्रसारण पर तत्काल संज्ञान लेने की मांग भी उठ रही है।
मीडिया जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में पत्रकारिता और प्रचार के बीच की दूरी लगभग खत्म हो सकती है। तकनीक ने सूचना को तेज जरूर किया है, लेकिन उसी तेजी के बीच पत्रकारिता की विश्वसनीयता, भाषा की मर्यादा और जनता का भरोसा बचाए रखना अब सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

