खून के साए में खामोश कॉलोनी
दुर्ग हत्याकांड ने उठाए सवाल - क्या वर्दी वाले का घर भी सुरक्षित नहीं, और सिस्टम किस मोड़ पर खड़ा है?

दुर्ग hct : STF परिवार हत्याकांड जिले के सुपेला थाना क्षेत्र की तितरुडीह कॉलोनी में जो हुआ, उसे सिर्फ एक सनसनीखेज वारदात कह देना आसान है, लेकिन असल सवाल इससे कहीं गहरा है। शनिवार सुबह एक महिला ने एसटीएफ कांस्टेबल के घर में घुसकर उसकी पत्नी और मासूम बेटे की हत्या कर दी, जबकि बेटी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है। पहली नजर में यह एक व्यक्तिगत रंजिश या संबंधों के उलझे धागों का मामला लग सकता है, लेकिन जैसे-जैसे परतें खुलती हैं, यह घटना सीधे उस सुरक्षा तंत्र पर सवाल खड़ा करती है, जिसके भरोसे आम लोग ही नहीं, बल्कि खुद पुलिसकर्मी भी जीते हैं।
जब खाकी का घर ही असुरक्षित हो
सबसे चुभता सवाल यही है कि जिस व्यक्ति की ड्यूटी सुरक्षा देने की है, उसके अपने परिवार की सुरक्षा किसके भरोसे है? कांस्टेबल ड्यूटी पर था, घर में उसकी गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर हमलावर सीधे भीतर तक पहुंच गई। यह कोई सुनसान इलाका नहीं, बल्कि पुलिस से जुड़े परिवारों की कॉलोनी है। ऐसे में बिना किसी रोक-टोक के घर में घुसकर वारदात को अंजाम देना केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था की खुली पोल जैसा है। अगर यहां यह संभव है, तो आम बस्तियों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
STF सिस्टम की परतें और अनकहे जोखिम
यह घटना एक और असहज सच सामने लाती है – क्या हमारे सुरक्षा बलों के जवान सिर्फ ड्यूटी के दौरान ही नहीं, बल्कि निजी जीवन में भी जोखिम ढो रहे हैं? एसटीएफ जैसी संवेदनशील इकाई में काम करने वाले जवान अक्सर कई मामलों में सीधे टकराव की स्थिति में रहते हैं। ऐसे में उनके परिवारों की सुरक्षा को लेकर कोई ठोस प्रोटोकॉल है या नहीं ? यह सवाल अब और तेज हो गया है। क्या यह मान लिया गया है कि खतरा सिर्फ ड्यूटी तक सीमित रहता है, या फिर सिस्टम ने आंखें मूंद रखी हैं?
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मोहल्ले की चुप्पी : डर या आदत?
दुर्ग STF परिवार हत्याकांड का एक और पहलू उतना ही परेशान करने वाला है—मोहल्ले की खामोशी। सुबह के वक्त, रिहायशी इलाके में इतनी बड़ी वारदात होती है और किसी को भनक तक नहीं लगती, या फिर लोग चुप रहना बेहतर समझते हैं। यह वही समाज है, जहां छोटी-सी आवाज पर लोग खिड़कियों से झांकने लगते हैं, लेकिन यहां खून बहता रहा और आसपास सन्नाटा पसरा रहा। सवाल यह है कि क्या यह डर था, या फिर धीरे-धीरे ऐसी घटनाओं के प्रति समाज की संवेदनशीलता ही खत्म होती जा रही है?
सीसीटीवी से आगे की कहानी
अब जांच एजेंसियां सीसीटीवी फुटेज, बयान और तकनीकी सबूतों के सहारे आगे बढ़ रही हैं। आरोपी की पहचान हो चुकी है और गिरफ्तारी भी हो गई है, लेकिन असली कहानी इन औपचारिकताओं से कहीं बड़ी है। यह मामला उन दरारों की ओर इशारा कर रहा है, जो सुरक्षा व्यवस्था, सामाजिक व्यवहार और व्यक्तिगत जोखिम के बीच कहीं गहराई में मौजूद हैं।

