घुसपैठ पर दावे, आंकड़ों में सवाल
अमित शाह के सख्त बयान के बीच UPA बनाम NDA के आंकड़े खड़े कर रहे नए सवाल, सियासत में घुसपैठ मुद्दा फिर गर्म

घुसपैठियों पर अमित शाह बयान से सियासत गरम
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 का बिगुल फूंकते अमित शाह घुसपैठ बयान के बाद सियासत गरमा गई है। कोलकाता में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने टीएमसी के शासन को अराजकता करार देते हुए कहा कि भाजपा सरकार बनते ही घुसपैठ और भ्रष्टाचार पर पूरी तरह लगाम लगाई जाएगी। अपने बयान में शाह ने चुनौती भरे अंदाज में कहा कि “जितना रोना है रो-धो लो, हम चुन-चुनकर हर घुसपैठिए को न सिर्फ मतदाता सूची से हटाएंगे, बल्कि देश से बाहर भी करेंगे।” इस बयान के बाद घुसपैठ का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गया है।

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आंकड़ों के बीच अमित शाह घुसपैठ बयान
घुसपैठ पर सख्ती के इन दावों के बीच उपलब्ध सरकारी आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। संसद में दिए गए जवाबों के अनुसार 2005 से 2013 के बीच, जब केंद्र में UPA सरकार थी, तब लगभग 80 हजार से अधिक अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को देश से बाहर भेजा गया। इस दौरान हर साल हजारों की संख्या में deportation दर्ज किए गए, जो 5 हजार से लेकर 14 हजार तक के बीच रहे। यानी कागजों पर कार्रवाई का आंकड़ा लगातार ऊंचा बना रहा।

NDA काल में आंकड़े क्यों रहे सीमित
इसके उलट 2014 के बाद, यानी NDA सरकार के दौरान शुरुआती चार वर्षों में करीब 1800 के आसपास ही deportation दर्ज किए गए। हाल के वर्षों में भी कुछ स्थानीय स्तर पर अभियान जरूर चले, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़े अपेक्षाकृत कम ही दिखाई देते हैं। यही वह बिंदु है, जहां शाह के सख्त तेवर और उपलब्ध आंकड़ों के बीच तुलना की चर्चा तेज हो गई है।
नीति बदली या आंकड़ों की कहानी अलग?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल deportation के आंकड़ों से पूरी तस्वीर नहीं समझी जा सकती। एक तरफ UPA काल में बड़ी संख्या में लोगों को बाहर भेजे जाने का रिकॉर्ड है, तो दूसरी ओर NDA सरकार के दौरान सीमा सुरक्षा, पहचान और रोकथाम जैसे उपायों पर अधिक जोर दिए जाने की बात कही जाती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या रणनीति बदली है या फिर आंकड़ों की प्रस्तुति अलग तरीके से हो रही है।
अमित शाह घुसपैठ बयान
सियासी बयान बनाम जमीनी हकीकत
अमित शाह का बयान चुनावी माहौल में निश्चित तौर पर असर डालने वाला है, लेकिन इसके साथ आंकड़े भी अपनी अलग कहानी कहते नजर आते हैं। घुसपैठ जैसे गंभीर मुद्दे पर सियासी दावों और वास्तविक कार्रवाई के बीच कितना अंतर है, यह अब मतदाताओं के सामने भी एक सवाल बनकर खड़ा है। और शायद यही वजह है कि हर चुनाव में यह मुद्दा फिर उठता है—कभी आरोप के रूप में, तो कभी वादे के रूप में।

