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9 साल में जजों के खिलाफ 8600 से ज्यादा शिकायतें !

लोकसभा में खुलासा: 2024 में सबसे अधिक 1170 शिकायतें, जांच ‘इन-हाउस प्रक्रिया’ से

भरोसे की चौखट पर उठते सवाल

hct desk : देश की न्याय व्यवस्था को आम नागरिक अंतिम आसरा मानता है। लेकिन जब उसी व्यवस्था के भीतर से शिकायतों की आवाज़ उठती है, तो सवाल भी उतने ही गंभीर हो जाते हैं। लोकसभा में पेश आंकड़ों ने इसी चिंता को एक बार फिर सामने ला दिया है। सरकार के अनुसार वर्ष 2016 से 2025 के बीच मौजूदा जजों के खिलाफ कुल 8639 शिकायतें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के कार्यालय को प्राप्त हुईं। यह संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस भरोसे की पड़ताल भी है जो लोग अदालतों से जोड़कर देखते हैं।

2024 : शिकायतों का सबसे भारी साल

कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लिखित उत्तर में बताया कि इन नौ वर्षों के दौरान शिकायतों की संख्या लगातार दर्ज होती रही, हालांकि वर्ष 2024 सबसे आगे रहा। अकेले इसी साल 1170 शिकायतें दर्ज की गईं, जो पूरे कालखंड में सर्वाधिक हैं। स्वाभाविक है कि जब एक ही वर्ष में शिकायतों का आंकड़ा चार अंकों में पहुंचे, तो पारदर्शिता और जवाबदेही पर चर्चा तेज हो जाती है।

सरकार ने स्पष्ट किया कि इन शिकायतों की जांच का दायित्व कार्यपालिका के पास नहीं होता। बल्कि न्यायपालिका स्वयं अपनी आंतरिक व्यवस्था के तहत इन मामलों को देखती है। इसे ‘इन-हाउस मैकेनिज्म’ कहा जाता है। यानी जजों के आचरण से जुड़े मामलों की समीक्षा न्यायपालिका के भीतर ही तय प्रक्रिया के अनुसार की जाती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए अनुशासन सुनिश्चित करना बताया गया है।

1997 की आधारशिला : आचरण के मानक

इस संदर्भ में मई 1997 के दो महत्वपूर्ण प्रस्तावों का उल्लेख भी किया गया। पहला था ‘रेस्टेटमेंट ऑफ वैल्यूज ऑफ ज्यूडिशियल लाइफ’, जिसमें न्यायाधीशों के लिए आचरण संबंधी मानक तय किए गए। दूसरा था ‘इन-हाउस प्रोसीजर’, जिसके जरिए उन मामलों में कार्रवाई की रूपरेखा निर्धारित की गई, जहां इन मानकों के उल्लंघन की शिकायत सामने आए। इन दोनों व्यवस्थाओं को न्यायपालिका की आंतरिक जवाबदेही का आधार माना जाता है।

प्रक्रिया के अनुसार, यदि शिकायत सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश या किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ हो, तो वह सीधे CJI को भेजी जाती है। वहीं, हाई कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों से जुड़ी शिकायतें संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास जाती हैं। इसके अलावा CPGRAMS जैसे केंद्रीकृत लोक शिकायत पोर्टल या अन्य माध्यमों से प्राप्त शिकायतों को भी संबंधित प्राधिकारी तक अग्रेषित कर दिया जाता है।

हालांकि, इन आंकड़ों के साथ यह सवाल भी स्वाभाविक रूप से उभरता है कि इतनी बड़ी संख्या में दर्ज शिकायतों का अंतिम परिणाम क्या रहा, कितने मामलों में जांच आगे बढ़ी और कितनों में कोई ठोस कार्रवाई हुई। फिलहाल सरकार ने प्रक्रिया की रूपरेखा तो स्पष्ट कर दी है, लेकिन आंकड़ों की गंभीरता न्यायिक जवाबदेही पर बहस को फिर से जीवित करती दिख रही है।

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