Chhattisgarh

अनियमित कर्मचारियों का टूटा सब्र, दिसम्बर में विशाल प्रदर्शन की तैयारी।

पांच साल से लेकर तीन दशक तक सेवाएँ देने के बाद भी नहीं मिला स्थायी दर्जा, कर्मचारियों ने सरकार के रवैये पर जताया आक्रोश

रायपुर hct : छत्तीसगढ़ अनियमित कर्मचारी फेडरेशन ने आखिरकार धैर्य की सीमा पार कर दी है। लगातार उपेक्षा से आहत संगठन ने दिसम्बर में विशाल प्रदर्शन करने का निर्णय लिया है। बैठक में तय किया गया कि यदि अब भी सरकार नहीं जागी, तो कर्मचारी आंदोलन को प्रदेशव्यापी रूप देंगे।

तीन दशक की सेवा के बाद भी ‘अनियमित’ का तमगा

पांच साल से लेकर तीस साल तक सेवा देने वाले कर्मचारी आज भी “अनियमित” कहलाते हैं। दरअसल, यही सबसे बड़ी विडम्बना है। जो कर्मचारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने में दिन-रात जुटे हैं, वे अब सम्मान और स्थायित्व की माँग कर रहे हैं। उनके मुताबिक, मौजूदा स्थिति किसी मध्यकालीन बंधुआ मजदूर से कम नहीं रह गई है।

सरकार के वादे और जमीनी सच्चाई में बड़ा फर्क

चुनाव से पहले भाजपा के कई वरिष्ठ नेता फेडरेशन के मंच पर पहुँचे थे। उन्होंने कर्मचारियों की समस्याएँ सुनीं और समाधान का भरोसा दिलाया था। हालांकि, सरकार बनने के 17 महीने बाद भी कोई ठोस पहल नहीं हुई। मोदी की गारंटी पत्र में “वचनबद्ध सुशासन” के अंतर्गत समीक्षा कमेटी की बात कही गई थी, मगर उसमें अनियमित कर्मचारियों को शामिल नहीं किया गया। यही कारण है कि अब यह वादा कागज़ी प्रतीक बनकर रह गया है।

लगातार संवाद के बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं

मुख्यमंत्री और मंत्री परिषद के कई सदस्यों से मुलाकातें हो चुकी हैं। इसके बावजूद, कर्मचारियों की मांगें अब तक अधर में हैं। फेडरेशन का कहना है कि सरकार की चुप्पी ही सबसे बड़ा संकेत है कि अनियमित कर्मचारियों की फाइलें अब राजनीतिक प्राथमिकता में नहीं रहीं।

वेतन संकट और न्यूनतम वेतन अधिनियम की अनदेखी

कर्मचारियों का आरोप है कि 2017 के बाद से न्यूनतम वेतन का पुनरीक्षण नहीं हुआ। इसी बीच, संविदा वेतन में भी अगस्त 2023 के बाद कोई वृद्धि नहीं की गई। कई विभागों में वेतन महीनों से अटका हुआ है। कुछ जगहों पर तो वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों की छंटनी भी की जा रही है। इन हालातों ने असंतोष को और बढ़ा दिया है।

शहर से दूर आंदोलन स्थल, भेदभाव पर सवाल

सरकार ने फेडरेशन के धरना स्थल को शहर से दूर तुता में निर्धारित किया है। जबकि अन्य संगठनों को शहर में प्रदर्शन की अनुमति मिलती रही है। यही कारण है कि कर्मचारी अब इसे आंदोलन को दबाने का प्रयास मान रहे हैं। फेडरेशन ने कहा कि यह व्यवहार लोकतांत्रिक अधिकारों की अनदेखी है।

फेडरेशन की मुख्य मांगें

संगठन की प्रमुख माँगें स्पष्ट हैं – नियमितीकरण, निकाले गए कर्मचारियों की बहाली, न्यूनतम वेतन का भुगतान, अंशकालीन कर्मचारियों को पूर्णकालीन दर्जा और आउटसोर्सिंग प्रणाली का अंत। कर्मचारियों का कहना है कि अब सरकार की “मौन नीति” उन्हें अनिश्चित भविष्य की ओर धकेल रही है।

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