Chhattisgarh

एक तीर से दो शिकार धर्म को मुद्दा बनाकर वोट की राजनीति कर रही कांग्रेस!

रायपुर। धर्मांतरण एक ऐसा मुद्दा जो तब जीवित होता है जब चुनाव नजदीक हो या फिर जब सत्ताधारी पार्टी को अपना स्वार्थ भुनाना हो। इन दोनों ही सूरतों में बलि का बकरा बनाया जाता है एक ऐसे समाज को जिनको अल्पसंख्यक होने का दंश सदियों से झेलना पड़ रहा है। किसी एक धर्म की महत्ता को बार-बार ताक पर रख एक ही समाज पर लांछन लगाना क्या यही धर्मनिरपेक्ष देश की परिभाषा है?
क्या हमने ऐसे देश या राज्य की कल्पना की थी जहां वोट बटोरने के लिए एक धर्म को मोहरा बनाकर आपस में लड़ाया जाए। मैं मसीह समाज का होने के बावजूद भी नारायणपुर में पुलिस बल के साथ हुए हिंसा की निंदा करता हूं क्योंकि दोषी चाहे कोई भी हो, किसी भी जाति, धर्म का हो दोषी दोषी होता है। लेकिन धर्मांतरण का जो आग जला कर हाथ सेकने का काम सरकार कर रही है उनके मंसूबे से भी हम अनजान नहीं हैं।

“धर्मो रक्षति रक्षितः”

मतलब हर कोई अपने धर्म की रक्षा करना जानता है और सभी अपने-अपने स्तरों पर अपने धर्म का प्रचार प्रसार करते हैं। लेकिन सिर्फ मसीह समाज से ही ऐसी क्या दुश्मनी है जिन्हें हर बार तिरस्कार किया जाता है। हिंदूवादी विचारधारा की बात कह कर किसी दूसरे धर्म के लोगों को बार-बार आहत करना क्या यही हमारे देश की परिभाषा है, भाईचारे की निशानी है? क्या हम हिंदू नहीं क्या हमारा समाज ईसाई होने से हम हिंदू होने का हक खो देते हैं? यह सारे सवाल इसलिए क्योंकि भले धर्म अलग है लेकिन हिंदुस्तान में रहने के नाते हम भी हिंदू हैं? फिर ऐसा क्यों किया जाता है कि बार-बार मसीह समाज के लोगों को अपमानित कर तिरस्कृत कर उन्हें इस हद तक नीचा दिखाया जाता है जैसे मसीह होना उनके लिए कोई श्राप हो।

आप सभी ने देखा होगा कि हिंदू धर्म के लोग भी सड़कों पर भागवत गीता की महत्ता बताते हैं वह जाति या धर्म नहीं देखते बस राहगीरों को रोककर भगवत गीता की महत्ता बताते हुए उन्हें उसे खरीदने की बात कहते हैं तो इसका मतलब क्या वह धर्म परिवर्तन करा रहे हैं? यह सामने वाले के ऊपर निर्भर करता है कि वह उस पुस्तक को खरीदना चाहता है या नहीं खरीदना चाहता उस पर कोई जोर जबरदस्ती नहीं है।

यह स्वीकार करने योग्य है तो फिर यह क्यों नहीं समझा जा रहा कि ईसाई समुदाय भी अपने धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए लोगों से मिलते हैं उन्हें अपने धर्म के प्रति जो उनका विश्वास है उसे अवगत कराते हैं उसके बदले में अगर कोई व्यक्ति उनसे प्रभावित होकर मसीह धर्म को अपनाना चाहता है या नहीं यह पूरी तरह उन पर निर्भर होता है। तो यह बात कहां से आ रही है कि जबरदस्ती धर्मांतरण किया जा रहा है?

सबसे ज्यादा यह बात सुनने को आती है कि पैसे के लालच में लोग धर्मांतरण कर रहे हैं। अगर यह कथित बातें जिनका वास्तविकता से कोई नाता नही है क्योंकि यहां आज हर एक परिवार में संपत्ति के लिए भाई भाई के बीच लड़ाई हो रहा है तो क्या भला मसीह समाज के लोग इतने संपत्ति वान हो गए कि अपनी संपत्ति को दूसरों को आसानी से दे देंगे लेकिन फिर भी अगर पैसों का लालच देकर धर्मांतरण की बात कही जा रही है, तो भी ऐसे में समाज की क्या गलती? यह तो जो धर्म परिवर्तन कर रहे हैं उस व्यक्ति की नियत पर तय होता है कि वह पैसे के लालच में अपने धर्म के साथ समझौता करने के लिए तैयार है या नहीं।

जब आप किसी छोटे बच्चे को जबरदस्ती उसकी मर्जी के खिलाफ अपना काम नहीं करवा सकते तो फिर इतने बड़े लोग होने के बाद क्या उन्हें जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करवाया जा सकता है? यह सोचने वाली बात है। क्योंकि जब भी धर्मांतरण का मुद्दा उठा है तब तक सवाल मसीह समाज का या उन ग्रामीणों का नहीं बल्कि हमेशा सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष के बीच चुनावी एजेंडा को लेकर उठा है।

भाजपा शासनकाल में यही कांग्रेस की सरकार भाजपा पर धर्मांतरण करवाने का आरोप लगाती थी तो अब कांग्रेस की सरकार में भाजपा कांग्रेस पर धर्मांतरण करने का मुद्दा उठा रही है। यह सारे कृत्य एक जाल है जो केवल वोट बटोरने के लिए इन नेताओं के द्वारा बुने गए हैं और इस जाल में फंस रहे हैं मासूम ग्रामीण और सदियों से तिरस्कार होते आ रहे मसीह समुदाय के लोग। न मसीह समाज इसके लिए कोई आवाज उठा रहे न ग्रामीण इसके लिए आवाज उठा रहे हैं यह सारा खेल इन सत्ताधारी लोगों का है।

अब अगर गौर करेंगे, नारायणपुर वाले मामले में तो देखेंगे कि जब ग्रामीण मिलकर एसपी के साथ हिंसा कर रहे थे तब पुलिस बचाव में नहीं आई बल्कि भागते नजर आई। क्या वाकई पुलिस जवानों के हाथ इतने बंधे हुए हैं कि वह अपने ऊपर हो रहे प्रहार को रोकने के लिए अपनी सुरक्षा के लिए कोई बचाव न करे? जब यही आदिवासी अपने मुद्दों को लेकर राजभवन या सीएम हाउस का घेराव करने आते हैं तो यही पुलिस वाले उन्हें वहां तक पहुंचने से रोकने के लिए कई बार लाठीचार्ज तक करने से पीछे नहीं हटे तो फिर जब एसपी पर इस तरह से हिंसा हो रही थी तो आखिर बचाव के लिए क्यों कोई भी पुलिस वाले आगे नहीं आए बल्कि भागते नजर आए? क्या बस्तर की पुलिस इतनी बेबस है? नहीं इसके पीछे की भी एक बड़ी साजिश है।

सत्ताधारी पार्टी आने वाले चुनाव में भला आदिवासी ग्रामीणों को नाराज कैसे कर सकती है! मतलब इस षड्यंत्र को समझने की अगर कोशिश की जाए तो यह इतना भी कठिन नहीं क्यों कि यह तो स्पष्ट तौर पर नजर आ रहा है कि जो पुलिस वाले ग्रामीणों पर सिलगेर वाले मामले में इतनी बर्बरता पूर्वक डंडे बरसा सकते हैं वह पुलिस वाले चुपचाप मार खाकर बिना अपने बचाव के लिए आवाज उठाये लौट जाएंगे। यह बात हजम नहीं हो रही। इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि जो हिंसा ग्रामीणों द्वारा पुलिस बल पर किया गया वह स्वीकार योग्य है, मैं इसकी कड़ी निंदा करता हूं।

यह जो खेल सरकार द्वारा खेला गया है जिसमें पुलिस जवानों को मोहरा बनाया गया है सरकार के इस षड्यंत्र कि मैं तारीफ करना चाहता हूं। वोट बटोरने के लिए धर्मांतरण की आग लगाकर और ग्रामीणों को लुभाने की बहुत अच्छी कोशिश सरकार द्वारा की गई। लेकिन इन सबके बीच में मसीह समाज को मोहरा बनाने की गलती जो उन्होंने की यह सरासर ना सिर्फ किसी एक धर्म विशेष को अपमान करना है बल्कि उनके विश्वास पर भी कड़ा प्रहार है।
अगर आप इन ग्रामीणों से जाकर मिलेंगे तो वह स्वयं यह बात कहते नजर आएंगे कि मसीह में उनके द्वारा विश्वास करके धर्म को अपनाया गया ना की कोई जोर जबरदस्ती हुई और हमें किन पर विश्वास करना है किन पर नहीं इस चीज की हमें स्वतंत्रता है लेकिन इसके बावजूद हमें जबरदस्त इस बात के लिए उकसाया जाता है कि हम यह मानें कि हमारा जबरदस्ती धर्मांतरण किया गया है आप जाकर खुद ग्रामीणों से बात कर सकते हैं।

मसीह समुदाय आहत इस बात से होता है कि हर बार आखिर क्यों उनके ही धर्म की खिल्ली उड़ाई जाती है उन्हें ही ताक पर रखा जाता है। गलती कोई विशेष जाति धर्म देखकर नहीं की जाती और गलत करने वाला चाहे किसी भी जाति धर्म का हो वह केवल अपराधी होता है। लेकिन सबसे ज्यादा मोहरा मसीह समाज को ही क्यों बनाया जाता है सिर्फ इसलिए कि हम शांतिप्रिय लोग हैं और लड़ाई करने में विश्वास नहीं रखते। *भाजपा शासनकाल में भी मसीह समुदाय के साथ इस तरह की घटनाएं नहीं हुई थी जितना कांग्रेस की सरकार में हो रही है।

कांग्रेस बार-बार धर्मांतरण की बात को लेकर आर एस एस और बी जे पी को मसीह समाज का दुश्मन कहते आई हैं लेकिन सच्चाई तो यह है कि जब से प्रदेश में कांग्रेस की सरकार आई है सबसे ज्यादा मसीह समाज के लोगों के साथ ही हिंसा हुई है। चाहे बात हो डोंगरगढ़ स्थित क्रॉस को तोड़ने की या किसी पादरी के घर में घुसकर उनके परिवार के साथ मारपीट करने की, ऐसी कोई भी अप्रिय घटना नहीं बची जो कांग्रेस की सत्ता प्रदेश में आने के बाद मसीह समाज के साथ ना घटित हुई हो। तो ऐसे में केवल भाजपा आर एस एस के प्रति ग्रामीणों को भड़का कर कांग्रेस के हित में जो वोट पाने का काम भूपेश सरकार कर रही है मैं उनसे आग्रह करना चाहता हूं कि मसीह समाज के लोगों को और ग्रामीणों को इतना भी मत ठगिये, इतना भी बेवकूफ मत समझिए कि वह आपकी चालाकी ना देख पाए। क्योंकि आप के शासनकाल में जितना मसीह समाज के लोगों का अपमान हुआ है उतना भाजपा शासनकाल में नही हुआ था। इसलिए अपनी गलतियों की गठरी दूसरे पर मढ़ने से अच्छा है भूपेश सरकार अपने लुटिया डूबने से बचाने की तैयारी कीजिये।

नितिन लॉरेंस छत्तीसगढ़ एक्टिविस्ट
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Dinesh Soni

जून 2006 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा मेरे आवेदन के आधार पर समाचार पत्र "हाइवे क्राइम टाईम" के नाम से साप्ताहिक समाचार पत्र का शीर्षक आबंटित हुआ जिसे कालेज के सहपाठी एवं मुँहबोले छोटे भाई; अधिवक्ता (सह पत्रकार) भरत सोनी के सानिध्य में अपनी कलम में धार लाने की प्रयास में सफलता की ओर प्रयासरत रहा। अनेक कठिनाइयों के दौर से गुजरते हुए; सन 2012 में "राष्ट्रीय पत्रकार मोर्चा" और सन 2015 में "स्व. किशोरी मोहन त्रिपाठी स्मृति (रायगढ़) की ओर से सक्रिय पत्रकारिता के लिए सम्मानित किए जाने के बाद, सन 2016 में "लोक स्वातंत्र्य संगठन (पीयूसीएल) की तरफ से निर्भीक पत्रकारिता के सम्मान से नवाजा जाना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्यजनक रहा।

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