Chhattisgarh

बेचापाल : सुरक्षा बलों और आदिवासियों के बीच लड़ाई; बलात्कार और मौत से बचने के लिए …

hct desk : सिलगेर, सारकेगुड़ा, एडसमेटा जैसे बड़े आंदोलन के बाद अब बेचापाल (बीजापुर) कैंप के विरोध में उतर आएँ है। 1 माह से मिरतुर के बेचापाल में 2 दर्जन से अधिक गांवों के हजारों आदिवासी सड़क, पुल-पुलिया और सुरक्षा बल के कैम्प का विरोध कर रहे हैं। दरअसल इन आदिवासियों का विरोध सड़क और पुल-पुलिया नहीं है बल्कि विकास के नाम पर जो सड़क और पुल – पुलिया बनाने के लिए सिलगेर, सारकेगुड़ा, एडसमेटा जैसे घने जंगलों में सुरक्षा बल के कैम्प का विरोध है।

ऐसा नहीं है कि घने जंगलों में रहने वाले आदिवासी विकास नहीं चाहते सड़क और पुल – पुलिया भी नहीं चाहते मगर सिर्फ सड़क और पुल – पुलिया ही विकास के आयाम नहीं है। विकास का सबसे सशक्त मार्ग तो शिक्षा और स्वास्थ्य भी है और यही मूलभूत सुविधा भी जिसकी मांग ये आदिवासी कर रहे हैं। मगर सरकार है कि समूचे बस्तर को छावनी में तब्दील करने को आतुर है और इसके लिए जगह – जगह कैम्पों की स्थापना किया जा रहा है, आखिर क्यों ?

विरोध : विकास का नहीं विनाश के लिए है

इन कैम्पों के खुलने के पीछे की वास्तविकता से प्रदेश की जनता का भले ही कोई सरोकार हो न हो लेकिन सरोकार है सत्तालोलुप जनप्रतिनिधि का जो इन स्थानों के नीचे दबी पड़ी अकूत धन सम्पदा है जिस पर अडानी – अम्बानी जैसे धन्ना सेठों की वक्रदृष्टि गड़ी हुई है जिसे बेचकर अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी कोठी भरने के वास्ते इन जंगलों को नष्ट किया जाना है और इस सम्पदा को सुगमतापूर्वक निकालने हेतु मूलभूत मांगों को दरकिनार करते हुए भाजपा और कांग्रेस के उद्योगपति मित्रों के हितार्थ समूचे वनांचल क्षेत्रों में वृहद् पैमाने पर सशस्त्र बलों की तैनाती की जा रही है।

इन्हीं सुरक्षा बलों के जवानो के द्वारा जब वे अपने घरों से दूर जंगलों में सर्चिंग के नाम पर जो विचरण करते हैं; तब उनका सामना होता है इन जंगलों में निवासरत आदिवासी परिवार से तब यही जवान उन बेकसूर आदिवासियों घरों में घुसकर मासूम बच्चियों और महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं और पुरुषों को नक्सली करार देकर मौत के घाट उतार देते है बस यही लड़ाई है आदिवासियों और सुरक्षा बलों के बीच। यह लड़ाई है बलात्कार और मौत से बचने के लिए…

दर्जन भर से ज्यादा स्थानों में कई बड़े आंदोलन बदस्तूर जारी

बीते पिछले तीन सालों से देखा जाए तो बस्तर के अलग-अलग क्षेत्रों में ज्यादातर अंदरुनी क्षेत्रों में सरकार और सुरक्षा बल और उनके कैम्प के विरोध में लगभग दर्जन भर से ज्यादा स्थानों में कई बड़े आंदोलन बस्तर के आदिवासी कर रहे हैं। एक तरफ जहां सिलगेर में लगभग साल भर से चल रहे पुलिस कैंप का विरोध थम नहीं रहा है वहीं अब मिरतुर थाने के ग्राम बेचापाल और हुर्रेपाल में लगभग 31 गांव के ग्रामीण सुरक्षा बलों के कैंप और सड़क के विरोध में लामबंद हैं।

माह नवंबर से कैम्प की स्थापना और सड़क निर्माण कार्य रोकने को लेकर मिरतुर क्षेत्र के बेचापाल में दर्जनों गांवों के हजारो आदिवासी मोर्चे पर डटे है। आंदोलन महीने भर से बदस्तूर जारी है…। नक्सली दहशत के कारण यहां पुलिस की चौकसी भी तगड़ी है। वहीं कुछ दिन पहले अपने देवी धामी और पेन को लेकर मिरतुर पहुंचे प्रदर्शनकारियो और पुलिस के बीच माहौल तनावपूर्ण हो गया था।

आंदोलनकारियों को समझाइश देने क्षेत्रीय विधायक विक्रम पहुंचें आन्दोलनस्थल !

आंदोलनकारी आदिवासियों से मिलने भूपेश बघेल मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन के विधायक विक्रम मंडावी 29/12 को आंदोलनरत आदिवासियों को समझाइश देने जी हाँ, सोशल मीडिया के हवाले से आंदोलनकारियों को समझाइश देने क्षेत्रीय विधायक विक्रम पहुंचें आन्दोलनस्थल।
बीजापुर विधायक विक्रम मडावी ने बेचापाल जाकर प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की। मिरतुर इलाके के बेचापाल गांव में 30 नवंबर से करीब 3000 ग्रामीण सरकार के खिलाफ़ आंदोलन में जुटे हुए हैं। आंदोलन कर रहे ग्रामीणों में महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं।

भीड़ के पीछे खाना लिए बैठा आदिवासी बच्चा जो आंदोलन से अनजान हैं…

ग्रामीणों से पूछने पर उन्होंने बताया कि हमें अपने इलाके में न तो सुरक्षा कैम्प चाहिए और न ही सड़क चाहिए। सड़क और सुरक्षा कैम्प बनते ही सुरक्षा बल के ज़वान हमारे गांवों में घुसकर बेकसूर ग्रामीणों को फर्जी नक्सल प्रकरण जैसे तमाम मामलों में फंसाकार निर्दोष आदिवासी ग्रामीणों को बेवजह गिरफ्तार करेंगे और हमारे गांव की महिलाओं पर पुलिस के जवान अत्याचार करेंगे। साथ ही निर्दोष आदिवासी ग्रामीणों को नक्सली बताकर फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया जाएगा। विधायक ने प्रदर्शनकारियों को भरोसा दिलाया कि उनकी मांगों को वे सरकार तक पहुंचाएंगे…मगर 30 दिनों से चल रहे बेचापाल आंदोलन और कोने में बुखार से पीड़ित व्यक्ति पर विधायक महोदय की नजर नहीं पड़ी जो आंदोलन में डटा हुआ है…

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Dinesh Soni

जून 2006 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा मेरे आवेदन के आधार पर समाचार पत्र "हाइवे क्राइम टाईम" के नाम से साप्ताहिक समाचार पत्र का शीर्षक आबंटित हुआ जिसे कालेज के सहपाठी एवं मुँहबोले छोटे भाई; अधिवक्ता (सह पत्रकार) भरत सोनी के सानिध्य में अपनी कलम में धार लाने की प्रयास में सफलता की ओर प्रयासरत रहा। अनेक कठिनाइयों के दौर से गुजरते हुए; सन 2012 में "राष्ट्रीय पत्रकार मोर्चा" और सन 2015 में "स्व. किशोरी मोहन त्रिपाठी स्मृति (रायगढ़) की ओर से सक्रिय पत्रकारिता के लिए सम्मानित किए जाने के बाद, सन 2016 में "लोक स्वातंत्र्य संगठन (पीयूसीएल) की तरफ से निर्भीक पत्रकारिता के सम्मान से नवाजा जाना मेरे लिए अत्यंत सौभाग्यजनक रहा।

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