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उत्तर प्रदेश के पूर्व डी.जी.पी. प्रकाश सिंह ने कहा कि पुलिस के कामकाज में खामियों को स्वीकार किया जाना चाहिए और उन्हें ठीक किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि 20 वर्षों में हिरासत में होने वाली 1,888 मौतें भारत के आकार और आबादी वाले देश के लिए कोई बड़ी संख्या नहीं है। लेकिन जो महत्वपूर्ण है, वह यह है कि पुलिसकर्मी थर्ड-डिग्री तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, हिरासत में एक व्यक्ति को चोट पहुंचाते हैं। यह गलत प्रथा है। पुलिसकर्मियों को संवेदनशील और शिक्षित करने की जरूरत है, उन्हें जांच के वैज्ञानिक तरीकों और उचित पूछताछ तकनीक पर भरोसा करना चाहिए।

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में चोरी के आरोप में संदेह के आधार पर पकडे गए युवक पंकज बेक की 21 जुलाई 2019 को पुलिस हिरासत में मौत हो गई। इस मामले ने तब तूल पकड़ा; जब मृतक के शरीर में चोट के निशान पाए गए थे। गौरतलब है कि, सूरजपुर जिले के भटगांव थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम सलका – अधिना निवासी पंकज बेक; पिता अमीरसाय 30 वर्ष को एक व्यवसायी के घर से 13 लाख चुराने के आरोप में अभियुक्त बनाया गया था।

21 जुलाई को पुलिस ने उसे घर से बुलाकर हिरासत में लिया था। पुलिस के अनुसार रात करीब 11.30 बजे वह साइबर सेल की कस्टडी से फरार हो गया था, फिर करीब सवा 1 बजे उसकी लाश डॉक्टर परमार के हॉस्पिटल के कूलर से पाइप के सहारे फांसी पर लटकी मिली थी। हालांकि पंकज बेक कथित आत्महत्या के मामले में मजिस्ट्रियल जाँच करवाई गई थी; जिसमें मौत की वजह दम घुटने से दर्शाया गया है। मामले में कोतवाली प्रभारी सहित 5 अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है।

‘पंकज बेक और अल्ताफ’ की मौत में है समानता

अल्ताफ की मौत ने एक बार फिर से हिरासत में होने वाली मौतों को लेकर बहस छेड़ दी है। इस मौत से पुलिस महकमा कटघरे में है। कासगंज पुलिस के अनुसार, अल्ताफ ने थाने के शौचालय में लगे 2 फीट की ऊँची नल की टोंटी पर फांसी का फंदा बनाकर आत्महत्या कर लिया !

कासगंज पुलिस ने कहा कि; अल्ताफ ने थाने के शौचालय में लगे 2 फीट के नल की टोंटी पर चड्डी के नाड़े को फांसी का फंदा बनाकर आत्महत्या कर ली। यह बात समझ से भी परे है कि; साढ़े 5 फुट का आदमी 2 फुट के नल से लटककर खुदकुशी कैसे कर सकता है ! लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी अल्ताफ की मौत की वजह हैंगिंग बताई गई है। कासगंज पुलिस का कहना है कि इस मामले की जांच निष्पक्ष तरीके से की जा रही है, और मामले को मामले को जांच के लिए मजिस्ट्रेट के पास भी भेजा गया है। इस घटना के बाद पांच पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया गया है।

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ख़बरों के आंकलन और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) से प्राप्त डेटा

नवम्बर महीने की गुनगुनाती ठण्ड के दस्तक देते ही उत्तर प्रदेश के कासगंज में 22 साल के एक युवक अल्ताफ की पुलिस हिरासत में मौत ने इस खबर को खंगालने को विवश कर दिया, फिर तलाश शुरू हुआ कि अब तलक विगत एक – दो दशक में ऐसे कितने प्रकरण उजागर हुए जो पुलिस हिरासत में मौत के आंकड़े को दर्शाता हो। विभिन्न ख़बरों के आंकलन और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) से प्राप्त डेटा को देखा जाए तो आंकड़े डराने वाले सामने आए। देशभर में बीते 20 बरस में 1888 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में हुई है। हिरासत में मौत मामले में पुलिसकर्मियों के खिलाफ 893 मामले दर्ज हुए हैं। 358 के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किए गए। लेकिन दोषी करार सिर्फ 26 पुलिसकर्मी हुए हैं।

गुजरात में सबसे अधिक मौतें

एन.सी.आर.बी. के आंकड़ों के अनुसार हिरासत में हुई मौतों के लिए 2006 में सबसे ज्यादा 11 पुलिसकर्मी दोषी ठहराए गए थे, जिसमें उत्तर प्रदेश में 7 और मध्य प्रदेश में 4 लोग दोषी पाए गए थे। पिछले साल यानि कि 2020 में 76 लोगों की मौत हिरासत में हुई है। जिसमें गुजरात में सबसे अधिक 15 मौतें हुई हैं। इनके अलावा आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल से भी ऐसे मामले सामने आए हैं।

हालांकि, पिछले साल किसी को भी दोषी करार नहीं दिया गया है। पिछले 4 सालों में हिरासत में हुई मौतों के सिलसिले में 96 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि, इसमें पिछले साल का डाटा शामिल नहीं है। ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि 2001 के बाद से रिमांड पर नहीं श्रेणी में 1185 मौतें और रिमांड श्रेणी में 703 मौतें हुई हैं। पिछले 2 दशकों के दौरान हिरासत में हुई मौतों के संबंध में पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज 893 मामलों में से 518 उन लोगों से संबंधित हैं, जो रिमांड पर नहीं थे।

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