Ad space

रायपुर (hct)। बस्तर संभाग के सुकमा-बीजापुर ज़िले के सीमावर्ती गांव सिलगेर में सीआरपीएफ के द्वारा नक्सलियों के खिलाफ अभियान में जुटे सुरक्षा बल के जवान बीजापुर-सुकमा जिले की सीमा पर स्थित सिलगेर गांव में एक कैम्प बना रहे हैं। स्थानीय ग्रामीण इस कैम्प का विरोध कर रहे हैं। ग्रामीणों का तर्क है कि सुरक्षा बलों ने कैम्प के नाम पर उनके खेतों पर जबरन कब्जा कर लिया है। इस नए कैंप का हजारों की संख्या में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन के दौरान 17 मई को सुरक्षा बलों ने गोली चला दी। इसमें तीन ग्रामीणों की मौत हो गई। भगदड़ में घायल एक गर्भवती महिला की भी कुछ दिनों बाद मौत हो गयी। पुलिस का कहना था कि ग्रामीणों की आड़ में नक्सलियों ने कैम्प पर हमला किया था।

बे गतिरोध और चर्चाओं के बाद 10 जून को शासकीय षड्यंत्र में आदिवासी समाज की एक ख्यातिलब्ध नेत्री को मोहरा बनाकर उसके कंधे से तीर चलाया गया और “बिकाऊ दलाल मीडिया” के माध्यम से यह अफवाह फ़ैलाने की असफल कोशिश की गई कि ग्रामीण आंदोलन स्थगित कर सिलगेर से वापस लौट गए ! इस सम्बन्ध में जब प्रदेश के गृहमंत्री माननीय ताम्रध्वज साहू से जवाब तलब किया गया तो उनका कहना था कि –आदिवासियों का कहीं कोई आंदोलन नहीं चल रहा है; और जो हो रहा है वह प्रायोजित आंदोलन है।”  शुरुआत से इस जनआंदोलन को दबाने और माओवादी समर्थित बताने की लगातार कोशिशों के बावज़ूद, 6 माह से अधिक अवधि बीत चुकी है आंदोलन अनवरत जारी है…

जब सोनी सोरी से एक सवाल पूछा गया कि दीगर आंदोलन, मूल स्थान से परे देश अथवा प्रदेश की राजधानी में अमलीजामा पहनाया जाता है; लेकिन सिलगेर के इस आंदोलन को विगत 6 माह से भी अधिक अवधि बीत जाने के बाद भी यह सिर्फ सिलगेर तक ही सीमित है; क्यों ? तब उन्होंने जवाब दिया –

पश्चात् इसके 01 नवम्बर 2021 को जब समूचा प्रदेश राज्य स्थापना दिवस मना रहा था, उसी दिन ग्राम सिलगेर में आम सभा था; जिसमे सुकमा-बीजापुर जिलों के लगभग 10000 से अधिक ग्रामीण शामिल हुए थे।

02 नवम्बर को वापसी के दौरान चिंतालनार, बुर्कापाल कैम्पों के पुलिस बलों द्वारा मोरफल्ली गांव में 55 ग्रामीणों को पकड़कर नक्सली साबित करने की खबर मिली, ये सभी आदिवासी ग्रामीण कोटा क्षेत्र के ग्राम भंडारपदर, पुराना भेज्जी, जगरगुंडा इलाके से मोरपल्ली, कुम्मोड़तोंग, कारकनगुड़ा, दुलेड़ी के निवासी थे। इन में से 47 लोगों को तो छोड़ दिए गया, लेकिन 8 ग्रामीणों को पुलिस अधिकारीयों के द्वारा नक्सली होने का आरोप लगाकर जेल भेजने की जानकारी प्राप्त हुई।

इस सम्बन्ध में ग्रामीणों का कथन है कि; “हम लोग अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करके धरना में शामिल हुए थे। कई बार बस्तर के अधिकारी व खुद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने हमें आश्वासन दिया है कि जो लोग लोकतांत्रिक शांतिपूर्वक तरीके से आंदोलन में शामिल हो रहे हैं, उनको बिलकुल रोका नहीं जाएगा। फिर भी हर बार हमारे कार्यक्रम व आंदोलन में शामिल होने वाले लोगों को क्यों रोका जा रहा है ? थानों में बिठाया जाता है व पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया जाता है। हम मांग करते है की इन 8 लोगों को तुरंत बिना शर्त रिहा किया जाए।

इन तमाम प्रशासनिक आतंक के दुष्चक्र के बीच छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल नेतृत्व सरकार, सिलगेर के कैंप को हटाने के बजाय वहीं पर एक और कैंप खोलने जा रही है।

दहशत के कोख में दहक रहा “सिलगेर आंदोलन का बारूद”

अब, इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन के इतनी आसानी से ख़त्म हो जाने के आसार नज़र नहीं आते। और यह आंदोलन सिलगेर से निकल कर बस्तर संभाग के विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से फैल रहा है। एक खबर के मुताबिक; आदिवासियों का संघर्ष बस्तर के बीजापुर जिले से शुरू होकर दंतेवाड़ा की तरफ भी पहुंच रहा है। 11 नवम्बर को दंतेवाड़ा जिले के नहाड़ी पंचायत में हजारों की संख्या में आदिवासी एकजुट हुए। ये आदिवासी ग्रामीण मूलनिवासी बचाओ मंच और जेल बंदी रिहाई समिति के बैनर तले इकट्ठा हुए थे।

इसके अतिरिक्त हिडमे मरकाम जिसे दंतेवाड़ा पुलिस द्वारा 1 लाख ईनामी नक्सली के नाम के आरोपी के तौर पर गिरिफ्तार कर जेल भेजा गया है उनकी रिहाई की भी मांग ग्रामीण कर रहे थे। अवगत हो कि बीते 9 मार्च, 2021 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन छत्तीसगढ़ की युवा सामाजिक व मानवाधिकार कार्यकर्ता हिडमे मरकाम को दंतेवाड़ा जिले के अरनपुर थाने की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी को तब अंजाम दिया गया जब वे अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर समेली, जिला दंतेवाडा में दो युवा आदिवासी महिलाओं के साथ हिरासत में की गई शारीरिक और यौन हिंसा के विरोध में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रही थीं।

तस्वीर : साभार जनचौक।

हिडमे मरकाम पर बलवा, हत्या, अवैध हथियार रखने और नक्सली गतिविधियों में संलिप्त होने के आरोप पुलिस द्वारा लगाए गए हैं। जबकि उन्हें रिहा करने व सारे मामले वापस लेने के लिए एक हजार की संख्या में विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पत्र लिखा है। वहीं इस मामले में पुलिस पर यह आरोप भी है कि उसने कवासी हिडमे नामक एक दूसरे व्यक्ति पर दर्ज मामले में हिडमे मरकाम को गिरफ्तार किया है।

बस्तर के युवा पत्रकार तामेश्वर सिन्हा “जनचौक” के लिए लिखते हैं “विगत दो साल में ऐसे कई मौके आए जब जल, जंगल और जमीन के लिए आदिवासियों को आंदोलन का रुख करना पड़ा। कभी पहाड़ियों पर माइनिंग, कभी देवी-देवताओं के स्थल, कभी कैंप के विरोध में बस्तर के आदिवासियों ने मुखर होकर प्रदर्शन का रास्ता अख्तियार कर लिया है।”

whatsapp group

 

 

 

ad space

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here