विपक्ष में रहें तब आदिवासियों की हितैषी
जब सत्ता में हो तब आदिवासी माओवादी ऐसा क्यों ?

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छत्तीसगढ़ आदिवासी बाहुल्य राज्य है जहां की धरती जल जंगल जमीन और खनिज संपदा से भरी हुई थी लेकिन कॉरपोरेट लूट के चलते इसका अधिक से अधिक दोहन हुआ है और साथ ही राज्य में मूलनिवासी आदिवासियों के ऊपर दमन तेज होने के साथ साथ प्रकृति का तेजी से विनाश हुआ है। 01 नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश से पृथक होकर छत्तीसगढ़ राज्य बना जिसे 21 साल पूरे हो गए। छत्तीसगढ़ राज्य बनने का परिकल्पना यही था कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में मूलनिवासियों का राज हो शिक्षा, स्वास्थ्य रोजगार और बुनियादी तथा नागरिक सुविधाओं में इजाफा हो। परंतु विकास के नाम पर कुछ क्षेत्र में भवनों, सड़कों का निर्माण तथा असमान विकास ही हुआ है।

तत्कालीन भाजपा की मुख्यमंत्री रमनसिंह की सरकार में सलवा जुडूम नाम से कथित तौर पर माओवादियों के खिलाफ जन आंदोलन के नाम पर अभियान चलाया गया था जिसमे 18 वर्ष से कम उम्र के आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी (एस पी ओ) बनाकर आदिवासियों के खिलाफ आदिवासियों का खूनी युद्ध छेड़ दिया गया था जिसे माननीय उच्च न्यायालय की हस्तक्षेप से निरस्त करना पड़ा, क्योंकि माओवाद की खात्मा के नाम पर फर्जी मुठभेड़ की घटनाएं और दमन काफी बढ़ गया।

एडसमेटा, सारकेगुड़ा, ताडिमेटला, मोरपल्ली, तिम्मापुर आगजनी एवं मुठभेड़ की सामने आयी जाँच रिपोर्ट ने फर्जी मुठभेड़ को साबित किया है जिसे सार्वजिनक करने की मांग ग्रामीण कर रहे हैं। उस समय विपक्ष में रहे कांग्रेस की पार्टी ने आदिवासियों के हित मे खड़ा होते दिखाई दिया था शायद उसी का परिणाम है कि वर्तमान में बस्तर संभाग के आठ विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस का ही विधायक है तथा मंत्री भी है लेकिन आज उनके आदिवासियों के साथ ईमानदारी से खड़ा होने का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा है।

एक नवम्बर को छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के 21 साल पूरा होने पर सिलगेर में करीब दस हजार से अधिक आदिवासी इकट्ठा होकर केन्द्र एवं राज्य सरकार से यह सवाल किया है कि क्या इसीलिए अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनाई गई है वन और खनिज संपदा से भरी बस्तर की धरती को उनकी मूल निवासियों की खून से रंग कर बड़े पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए हर 2 से 10 किलोमीटर की दूरी पर सशत्र बालों की कैम्प लगाई जायेगी। जहां कई वर्षों से रह रहे मूल निवासियों को कहीं भी आने जाने के लिए हर बार जानकारी व पहचान देना होगा।

ग्रामीण पहुंच मार्ग का निर्माण करने के बजाय राष्ट्रीय मार्ग या राष्ट्रीय राजमार्ग जैसे सड़को के जरिये वन माफियाओं को फायदा पहुंचाई जा सके? पेसा कानून का खुलेआम उलंघन किया जा सके? अपने मूलभूत आवश्यकताओं को पाने के लिए यदि आदिवासी आंदोलन करे तो उसे माओवादी अथवा माओवादी समर्थक बताकर उनका दमन किया जा सके? आजादी के 74 साल और छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के 21 साल बाद भी उनके जेहन में यह सवाल कौंध रहा है।

बस्तरिया मूलनिवासियों की मांगे क्यों नहीं मानी जाती है? बस्तर में नरसंहार क्यों जारी है? जेलों में बंद निर्दोष मूलनिवासियों की रिहाई क्यों नहीं? मूलनिवासियों का नक्सली/माओवादी के नाम पर झूठी मुठभेड़ व हत्याएं क्यों? बस्तर से पुलिस कैम्पों को क्यों नहीं हटाया जाता है? हमारे गांवों के स्कूलों को क्यों बंद/ स्थानांतरित किया गया है? हर गांव में स्कूल और सर्वसुविधायुक्त छात्रवास, शिक्षक, अस्पताल, डॉक्टर, शुद्ध पेयजल क्यों नहीं? मूलनिवासी बेरोजगारों को रोजगार क्यों नहीं? हमारे पानी को क्यों प्रदूषित किया जाता है? बैलाडीला का लाल पानी हमारे जन जीवन पर विपरीत असर क्यों डाल रहा है।

बैलाडीला के विस्थापित आज कहाँ कहाँ है किसी को पता है? छठवीं अनुसूची पर अमल क्यों नहीं जैसे हजारों सवाल के साथ मूलवासी बचाओ मंच के आदिवासियों ने रैली और सभा किया जिसमें दिल्ली किसान आंदोलन जिंदाबाद की नारों के साथ एकजुटता कायम की है।

केन्द्र व राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी अलग अलग लेकिन दमन एक जैसी

एक ओर जहां केन्द्र सरकार द्वारा लाई गई किसान, कृषि और आम उपभोक्ता विरोधी तथा बड़े पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने वाली नीतियों के विरोध में देश के किसान देश की राजधानी दिल्ली को जोड़ने वाली सीमाओं पर एक साल से आन्दोलन कर रहे हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के मूलनिवासी आदिवासी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं अस्पताल, स्कूल, आंगनबाड़ी, शुद्ध पेयजल, जाति प्रमाणपत्र आदि के लिए बीजापुर व सुकमा जिला के ग्रामीण सीमा सिलगेर में 12 मई 2021 से सड़कों पर बैठकर आंदोलन कर रहे हैं।

दिल्ली के आंदोलन में करीब 700 किसानों ने अपनी कुर्बानी दी है तो सिलगेर के आंदोलन में तीन पुरूष और एक गर्भवती महिला ने अपनी कुर्बानी दी है जिसे सी आर पी एफ के जवानों ने माओवादी कहकर गोली मार दिया। राजधानी दिल्ली को जोड़ने वाली सड़कों पर पुलिस ने कंटीले तार बिछा रखें हैं तो सुकमा और बीजापुर जिले की ग्रामों को जो जोड़ने वाली सड़क पर भी पुलिस ने कंटीले तार बिछा रखे हैं।

पुलिस की नजर में आंदोलनकारियों को समर्थन देना ग़ैरकानूनी हो गया है

आदिवासियों द्वारा सिलगेर में 12 मई से जारी आंदोलन और आयोजित राज्योत्सव में शामिल होने छत्तीसगढ़ के किसान, मजदूर, सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार संगठनों का 23 सदस्यीय दल सिलगेर पहुंचा। इस दल को पहली बार बीजापुर के आवापल्ली चेक पोस्ट पर रोका गया जहां सभी लोगों का नाम, पता, मोबाइल नंबर, गाड़ी नंबर और आगमन व गंतव्य स्थान की पूरी जानकारी दर्ज की गई इसी प्रकार और आठ जगहों पर दर्ज की गई।

10 वें स्थान तरेम थाना में सारी जानकारी दर्ज करने के बाद आगे जाने की बात कहकर शाम छः बजे से रात आठ बजे तक रोक दिया गया और थानेदार द्वारा अपनी बातों से मुकरते हुए वापस जाने या फिर बड़े अधिकारियों से लिखित अनुमति लाने की बात करने लगे। भारी विरोध और बड़े अधिकारियों से बड़ी मुश्किल से मोबाइल पर बात होने के बाद ही जहाँ मोबाइल का नेटवर्क भी सही तरह स्व नहीं मिल रहा था, थानेदार द्वारा जाने दिया गया। इस बीच हमारे प्रति थानेदार का आक्रोश झलक रहा था जो दूसरे दिन वापसी के समय देखने को मिला जो कह रहा था कि ये सब आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं जिनके खिलाफ भी वारंट भेजना पड़ेगा।

सिलगेर में मूलवासी आदिवासियों के आंदोलन का कारण

11 मई 2021 को सी आर पी एफ द्वारा चार किसानों कोरसा सोमा, मुसाखि लक्ष्मी, कोरसा कोसा और एक अन्य की करीब सात एकड़ जमीन पर जबरदस्ती रातो रात कैम्प बना दिया गया है। पुलिस का कहना है कि सड़क बनाने के लिए कैम्प लगया गया है जो राष्ट्रीय राजमार्ग जैसी चौड़ी पक्की सड़क बनाई जा रही है जिसकी जरूरत नहीं है क्योंकि आजू बाजू खेत की जमीन नष्ट हो रही है जबकि ग्रामीण पहुंच मार्ग को ही पक्का बनाया जा सकता है।

क्षेत्र में सैन्यीकरण की दहशत और सेना व पुलिस द्वारा लड़कियों, महिलाओं के ऊपर किये जाने वाले अत्याचार के विरोध में तथा जमीन बचाने के लिए 12 मई 2021 को ग्रामीणों ने आंदोलन किया जिनके ऊपर सशस्त्र बलों और पुलिस द्वारा ग्रामीणों के ऊपर चार दिन तक लाठीचार्ज किया गया जिससे आक्रोशित ग्रामीणों ने बड़ी संख्या में इकट्ठा होकर बीच सड़क में लगाई गई कंटीले तार को 17 मई को तोड़कर फेंक दिया इस दौरान सशस्त्र बलों द्वारा गोली चलाई गई जिसमें उएका पाण्डु 14 वर्ष, उसालम भीमा 35 वर्ष, कवासी बागा 35 वर्ष की गोली लगने से मौके पर मृत्यु हो गई बाद में लाठीचार्ज में घायल गर्भवती महिला पूर्णिमा सोमाली 23 वर्ष की मृत्यु हो गई। इस दिन आंसू गैस के गोले भी छोड़े गए। लाठीचार्ज से 296 लोग जख्मी हुए हैं तो गोली लगने से 18 लोग जख्मी हुए हैं।

आंदोलनकारियों की मांगे

छः महीने से मूलवासी बचाओ मंच के बैनर तले सिलगेर, बेंद्रे, दरबा, मिचिगुड़ा, कंदेड के ग्रामीण आदिवासी आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का मांग है कि पेसा कानून का उलंघन करते हुए आदिवासी किसानों की जमीन पर जबरदस्ती लगाए गए CRPF कैम्प को हटाया जाए। सशत्र बालों द्वारा गोली चालन से मृतकों के परिवार को एक एक करोड़ रुपये मुआवजा राशि दी जाए तथा घायलों को पचास पचास हजार रुपये मुआवजा राशि दिया जाए। छोटी सड़क ग्रामीण पहुंच मार्ग बनायी जाए। स्कूल, आंगनबाड़ी, राशन दुकान, अस्पताल, ग्राम पंचायत, शुद्ध पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं की पर्याप्त व्यवस्था किया जाए। पेसा कानून का अनिवार्य रूप से पालन किया जाए। बस्तर से सिलगेर सहित सभी पुलिस व अर्धसैनिक बलों के कैम्पों को हटाया जाए।

बस्तर में झूठी मुठभेड़ व नरसंहार बंद किया जाए। सिलगेर सहित सभी नरसंहारों के दोषी पुलिस अधिकारियों व जवानों को कड़ी सजा दिया जाए। एडसमेटा, सरकेगुड़ा, ताडिमेटला, मोरपल्ली, तिम्मापुरम आगजनी की जाँच रिपोर्ट के आधार पर दोषियों के ऊपर तुरंत कार्यवाही किया जाए।

जेलों में बंद निर्दोष छात्रों, नवजवानों सहित सभी मूलवासियों को निःशर्त रिहा किया जाए। जाति, निवास, आय प्रमाण पत्र जारी करने ग्राम सभाओं को अधिकार दिया जाए। उपरोक्त मांगो को माने जाने तक आंदोलन जारी रहेगा। अब देखना है कि आदिवासियों की हितैषी कहने वाली कांग्रेस की राज्य सरकार जब जारी आंदोलन के दौरान ही राजधानी रायपुर में आदिवासी महोत्सव करते हैं तो आंदोलनकारी मूलनिवासी आदिवासियों की मांगों के प्रति कितना गंभीर है।

मांगों को लेकर दल में शामिल प्रतिनिधि मंडल के सदस्यगण तेजराम विद्रोही सचिव अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा, जनक लाल ठाकुर पूर्व विधायक एवं अध्यक्ष छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, सौरा यादव संयोजक आदिवासी भारत महासभा, जागेश्वर जुगनू चन्द्राकर जिला पंचायत सदस्य महासमुंद, हेमंत कुमार टण्डन संयोजक अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा जिला रायपुर शीघ्र ही राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन से मुलाकात कर मांगो को मानने और मूलनिवासियों के पक्ष में खड़ा होने की बात करेंगे।

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