जिस कस्बे का नाम ही कब्रों से उल्लेखित हो वहां पर लाशो की राजनीति करने वाले नेताओं के लिए किसी की भी लाश बिछाना और वो भी ऐसे समय में जब लोकतंत्र के महायज्ञ की तैयारी चल रही हो, सम्भव है। उत्तर प्रदेश का एक बड़ा जिला और प्रशासनिक शहर जिसे पूर्व में लक्ष्मीपुर के नाम से जाना जाता था, और इसी शहर से लगभग 2 किलोमीटर दूर एक क़स्बाई स्थान है “खीरी”। अवगत हो कि; इसका नाम साईद खुर्द के अवशेषों पर निर्मित कब्र से लिया गया है।

घर के जोगी जोगड़ा; आन गांव के सिद्ध !

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छत्तीसगढ़। अचानक सुर्ख़ियों में आए लखीमपुर खीरी के आग की तपिश से अब छत्तीसगढ़ प्रदेश भी गरमा गया है। कारण कि प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल लखीमपुर खीरी हिंसा में मारे गए किसानों के परिवार को छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से 50-50 लाख रुपये देने का ऐलान किया है। उन्होंने घटना की कवरेज के दौरान मारे गए पत्रकार के परिवार को भी 50 लाख रुपये देने की बात कही है। ध्यान रहे कि छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से दी जाने वाली आर्थिक मदद योगी सरकार के मुआवजा राशि से ज्यादा है।

अवगत हो कि; 17 मई 2021 को आदिवासियों और सुरक्षाबल के जवानों के बीच बहस शुरू हुई और सुरक्षाबल के जवानों ने विरोध प्रदर्शन कर रहे लगभग 5000 आदिवासियों पर लाठी चार्ज करते हुए आंसू गैस के गोले दागने के बीच गोलीबारी शुरू कर दी जिसमें चार निर्दोष आदिवासियों सहित एक गर्भवती महिला की मौत हो गई। उक्त मामले को लेकर बस्तर के आईजी पुलिस सुंदरराज पी. ने मीडिया से कहा कि पहले भीड़ में शामिल माओवादियों ने फ़ायरिंग की जिसके जवाब में सुरक्षाबलों ने बाद में फ़ायरिंग की।

इनका कहना है :

  1. पी. सुंदरराज के इस बयानबाजी पर वरिष्ठ पत्रकार कमल शुक्ला; आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहते है – “छत्तीसगढ़ प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनते ही आताताई कल्लूरी के चेलों ने महारत हासिल कर लिया है। वे 5 से 7000 की भीड़ में चार माओवादियों को चुनकर मार डालने वाली बंदूके ईजाद कर ली है !”
  2. आदिवासी महासभा के नेता और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम कहते हैं – “प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की घटना बहुत दर्दनाक है. इस घटना को टाला जा सकता था लेकिन सुरक्षाबल के लोगों ने ऐसी कोई कोशिश नहीं की…”
  3. वहीं बिलासपुर हाईकोर्ट की अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला; आरोप लगाते हुए कहती हैं – “पुलिस ने बिना जाँच के घटना की शाम को ही कह दिया कि तीन माओवादी मारे गये लेकिन उनका नाम तक नहीं बता सकी।”

एडसमेटा की न्यायिक जाँच रिपोर्ट ने किया आग में घी का काम

तमाम दावों प्रतिवादों के बावजूद उक्त घटना को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के मुंह से आज दिनांक तक चूं तक नहीं निकली। आंदोलन को 5 महीने से भी अधिक समय बीत चुका है और सरकार के मुँह में ताला लगा हुआ है। आंदोलन चल ही रहा है…,

इसी बीच भाजपा शासनकाल में 8 वर्ष पूर्व बीजापुर जिले के एडसमेटा में दिनांक 17 मई 2013 को 8 ग्रामीणों (आदिवासी किसानों) को नक्सली बताकर जवानों द्वारा गोली मारी दी गई थी जिसकी न्यायिक जाँच रिपोर्ट पर फैसला आ चुका है। न्यायिक जांच रिपोर्ट में उन्हें ग्रामीण बताया गया है।

https://twitter.com/Chhotu_Vasava/status/1447060166394847234?t=HD2KsoFEGSgoI04G9AFZWA&s=19

अब एडसमेटा सरकेगुड़ा, सिलगेर और बस्तर में हो रहे नरसंहार के विरोध में बड़ी संख्या में इकठ्ठा हुए आदिवासी दो दिवसीय धरना प्रदर्शन कर रहे हैं…

गैरों पे करम अपनों पे सितम

आदिवासियों की मांग है कि, दोषियों पर कार्रवाई और पीड़ित परिजनों को 1 करोड़ और घायलों को 50-50 लाख मुआवजा दिया जाए। इस धरना प्रदर्शन (आंदोलन) में मूलवासी बचाओ मंच के बैनर तले 3 जिले सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा के करीब 5 हजार ग्रामीण इकट्ठा हो गए हैं बस्तर संभाग जेल बंदी रिहाई समिति ने भी मूलनिवासी बचाओ मंच को अपना समर्थन दिया है आदिवासी समाज सेविका सोनी सोरी भी मौजूद है। उनका कहना है कि यूपी में तो दिया गया पर बस्तर के साथ भेदभाव क्यों ?

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