देश में इस समय दो आंदोलन विगत लम्बे समय से चल रहा है और काफी चर्चित है। एक तरफ देश की राजधानी दिल्ली में किसान, कृषि कानून को लेकर आंदोलनरत हैं जहाँ साल भर से अधिक अवधि से स्वतःस्फूर्त आंदोलन में किसानों ने 600 से ज्यादा शहादतें दी, वहीं गणतंत्र दिवस पर लाल किला हिंसा, एक युवती से दुष्कर्म से लेकर टीकरी बॉर्डर पर एक शख्स को जिंदा जलाने जैसे दाग; किसान आंदोलन पर लग चुके हैं। किसान आंदोलन के दामन पर लगे दाग इस कदर गाढ़े हो गए हैं कि इन्हें साफ करना नामुमकिन है। तो वहीं दूसरी तरफ ३६गढ़ प्रदेश के बस्तर में सिलगेर आंदोलन भी विगत ५ महीने से निरंतर जारी है, ५ माह से चल रहे इस आंदोलन स्थल पर रोज 200 से 500 की संख्या अब भी उपस्थित रहती है चाहे पानी गिरे, या फिर कड़कड़ाती धूप, लोग डटे हुए हैं …
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सिलगेर में बवाल क्यों ?

दिनांक 12 मई 2021 को ३६गढ़ के बस्तर संभाग स्थित सिलगेर में सरकार ने सुरक्षा बलों का नया केम्प स्थापित कर दिया है, जिसका करीब 5000 से 7000 आदिवासी; इस नए केम्प का विरोध कर रहे थे कि, इस विरोध प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों के द्वारा अचानक गोलीबारी शुरू कर दी गई; जिसमें तीन निर्दोष आदिवासी गोली के शिकार हुए वहीं गोलीबारी से मची भगदड़ में एक गर्भवती महिला की मौत हो गई…

यह कोई पहला मौका नहीं था कि सुरक्षा बलों की गोली से कोई आदिवासी मारा गया हो…! बल्कि बस्तर में आदिवासियों को खाने के लिए अनाज मिले न मिले, उनके नसीब में गोली खानी जरूर लिखी है।

आपको आश्चर्य तो तब होगा, जब बस्तर के आईजी पी सुंदरराज ने पत्रकारों को यह बताया कि; “उक्त भीड़ में तीन ऐसे माओवादी शामिल थे, जिनकी नियत सुरक्षा बलों के केम्प में हमला करने की थी ! जो फ़ोर्स की गोलीबारी में मारा गया।” तब से लेकर अब तक इस आंदोलन को कभी बातचीत का रास्ता अख्तियार कर तो कभी छलपूर्वक दबाने – कुचलने में सरकार निरंतर असफल प्रयास कर रही है। इस प्रयास में सरकार और आदिवासी नेताओं की चुप्पी बहुत कुछ सन्देश देती है।

आखिर क्यों करते है आदिवासी केम्प का विरोध ?

लोग जब बस्तर की बात करते हैं तो उनकी जेहन से अनायास ही एक भयनुमा अनदेखा – अनसमझा “नक्सलवाद” का चेहरा उभरकर सामने आता है। मध्य प्रदेश के समय से ही बस्तर “प्रशासनिक नक्सलवादियों” का चरागाह रहा है। जब मध्यप्रदेश का बंटवारा हुआ; छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद का अभिशाप बतौर सौगात मिला। पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से निकल कर बस्तर की शांत फ़िजा में नक्सलियों ने कैसे अपनी पैंठ बढ़ा लिया यह शोध का विषय हो सकता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में पांव पसार चुके नक्सलवाद के असली पालक का दर्जा यदि कांग्रेस सरकार को दिया जाए; तो एक बानगी क्या इसे सच नहीं माना जा सकता..?

सरकार की मानें तो बस्तर में तैनात सुरक्षा बल, आदिवासियों की सुरक्षा और विकास के लिए कार्य कर रही है ! लेकिन सुकमा और बीजापुर जिला के मध्य में बसे सिलगेर जहाँ पर आदिवासी समुदाय से जुड़े स्थानीय लोग विगत ५ माह से आंदोलनरत हैं और इनके आंदोलन की मुख्य वजह है “बस्तर में तैनात फोर्स।” बस्तर जहाँ स्कूल और अस्पताल के नाम पर कुछ नहीं जबकि पूरे बस्तर में पुलिस कैंप या थानों की भरमार है। आदिवासियों को विकास के नाम पर कुछ भी हासिल नहीं हुआ, अलबत्ता नक्सलवाद और माओवादी विचारधारा से जुड़े होने का आरोप लगाकर या तो जेलों में ठूंस दिए गए या फिर नक्सली करार देते हुए गोलियों से भून दिए गए।

सिलगेर : आंदोलन की मुख्य वजह

दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार बीजापुर से सुकमा जिला के घोर नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में काफी लंबे समय से सड़क निर्माण का कार्य कर रही है, बताया जाता है कि, यह सड़क बीजापुर जिले को सुकमा जिला के दोरनापाल, जगरगुंडा जैसे घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से होकर गुजरेगा जिसके चलते इस क्षेत्र में विकास संभव हो पायेगा। सड़क की चौड़ाई काफी है जबकि इन क्षेत्रों में रहने वाले गरीब आदिवासियों के पास इन सड़कों पर चलाने हेतू गाड़ी ही नहीं है। सड़क निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा की दृष्टि से जगह – जगह पुलिस कैंप लगाया गया जिसका विरोध यहाँ के स्थानीय आदिवासी आज भी कर रहे है।

आंदोलनरत आदिवासियों की मानें तो सड़क निश्चित तौर विकास की दिशा में सराहनीय कदम है, लेकिन फोर्स के द्वारा आदिवासी समुदाय से जुड़े हुए लोगों पर अत्याचार यह असहनीय है। बस्तर में लगातार पुलिस फोर्स के द्वारा आदिवासियों पर अत्याचार किया जाता है। लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई जा रही है, जबकि सरकार तमाशबीन बने हुए चुपचाप बैठी हुई है। पिछले दिनों सिलगेर और बस्तर में आदिवासियों के ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ सर्व आदिवासी समाज छत्तीसगढ़ ने राज्य के अनेक जिलों में विरोध प्रदर्शन कर सरकार को चेताने का कार्य किया है।

सिलगेर आंदोलन से जुड़े हुए लोगों की कुछ दिन पहले; मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन से मुलाकात भी हुई थी, उसके बाद भी यह आंदोलन समाप्त नहीं हो पाया यह विचारणीय मुद्दा है ! जबकि इस आंदोलन से जुड़े कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनके बारे में सच उजागर हो गया तो लाल लड़ाकों के इस गढ़ ने कईयों के घर को लाल कर दिया है।

सिलगेर में विरोध की ज्वालामुखी अभी शांत नहीं हुआ है।

सिलगेर आंदोलन की आग अब तक सुलग ही रही है; फ़र्क़ बस इतना है कि, आदिवासियों के इस आंदोलन पर अब कोई चर्चा नहीं कर रहा है ! किसानों के देशव्यापी आंदोलन में कांग्रेसी भी शामिल, पर छत्तीसगढ़ में बस्तर के सिलगेर में हो रहे आंदोलन के कवरेज के लिए पत्रकारों पर रोक ! शांतिपूर्ण आंदोलन को माओवादी आंदोलन घोषित कर बदनाम किया जा रहा है। इस मुद्दे पर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और खुद आदिवासी विधायक मोहन मरकाम ने तो बेशर्मी की हद लांघते हुए, उल्टा आंदोलन में बैठे आदिवासियों को माओवादी समर्थक करार दिया है !          क्रमशः…

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