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धमतरी। छत्तीसगढ़ राज्य के बड़े बांधों में से महानदी पर बने गंगरेल बांध Dam की खूबसूरती सभी को लुभाती है और आकर्षित करती है, लेकिन इसकी खुबसूरती के पीछे हजारों परिवार की आंसू छिपे हुए हैं जिन्हें बहुत ही कम ही लोग महसूस कर पाते होंगे। पर्यटन के दृष्टि से from the point of view of tourism यह बांध लाखों लोगों की पसंदीदा जगहों में से एक है। जिसके चलते लाखों लोग यहाँ रोजाना आते हैं। लेकिन इस बांध के लिए कितने लोगों ने अपनी जमीन जायजाद की कुर्बानी दी, इस बात से लोग अंजान हैं। गंगरेल बांध के नाम पर कई गांव डूबान में शामिल हो गए। बांध बनने में लगा था 6 साल का समय और 55 से ज्यादा गांव जलग्रहण क्षेत्र में समा चुके।

गंगरेल बांध निर्माण के लिए सन् 1965 में सर्वे का काम शुरु हो चुका था। सबसे पहले ग्राम छटियारा के पास बांध बनाने के लिए जगह की तलाश की गई, पर तकनीकी कारणों के चलते यहां बांध का निर्माण संभव नहीं हो सका। इसके बाद वर्तमान जगह पर गंगरेल गांव के पास दो पहाड़ों की बीच इसका निर्माण करने का निर्णय लिया गया। इस कार्य का शिलान्यास 5 मई 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी Prime Minister Indira Gandhi ने किया था। इस बांध की नींव बनाने का काम रेडियो हजरत नाम की कंपनी ने किया। इसके बाद सागर कंपनी तथा मित्तल एंड कंपनी के साथ ही कुछ अन्य छोटी बड़ी कंपनियों ने इस कार्य को पूरा किया। करीब 6 साल तक लगातार काम चलने के बाद 1978 में बांध बनकर तैयार हुआ।

55 गांव के लोगों ने दी थी जमीन; तब बना गंगरेल बांध।
9 हजार परिवार के सपने हुए चूर…

32.150 टीएमसी क्षमता वाले इस बांध का जलग्रहण क्षेत्र मीलों तक फैला हुआ है। इसमें धमतरी के अलावा बालोद व कांकेर जिले का भी बड़ा हिस्सा शामिल है। जब बांध अस्तित्व में आया, तब तक 55 गांव इसके जलग्रहण क्षेत्र में समा चुके थे। इनमें ग्राम गंगरेल, चंवर, चापगांव, तुमाखुर्द, बारगरी, कोड़ेगांव, मोंगरागहन, सिंघोला, मुड़पार, कोरलमा, कोकड़ी, तुमाबुजुर्ग, कोलियारी, तिर्रा, चिखली, कोहका, माटेगहन, पटौद, हरफर, भैसमुंडी, तासी, तेलगुड़ा, भिलई, मचांदूर, बरबांधा, सिलतरा, सटियारा समेत अन्य गांवों के लोग ऊपरी क्षेत्रों में आकर बस गए।

16 हजार 704 एकड़ जमीन डूबी

गंगरेल बांध में जल भराव होने के बाद 55 गांवों में रहने वाले 5 हजार 347 लोगों की 16 हजार 496.62 एकड़ निजी जमीन व 207.58 एकड़ आबादी जमीन सहित कुल 16 हजार 704.2 एकड़ जमीन डूब गई। इनमें ग्राम बारबरी के मालगुजार त्रयंबक राव जाधव, कोड़ेगांव गांव के भोपाल राव पवार, कोलियारी के पढ़रीराव कृदत्त सहित अन्य मालगुजारों की जमीन भी शामिल थी।

कभी लगते थे मड़ई मेले

बांध की डूब में आ चुके कई गांवों में अनेक देवी-देवता विराजमान थे, जिनके नाम पर हर साल होने वाले मड़ई मेले काफी मशहूर थे। वर्तमान में बांध के एक छोर में स्थापित आदि शक्ति मां अंगार मोती की मूर्ति पहले करीब 10 किलो मीटर दूर डूब में आ चुके ग्राम चंवर में स्थापित थी। आज भी इस देवी की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। ग्राम लमकेनी में देवी मनकेशरी विराजित थी, जिन्हें बाद में ग्राम कोड़ेगांव में स्थापित किया गया। भिड़ावर में रनवासिन माता, कोरलमा में छिनभंगा माता के मंदिर आसपास के क्षेत्रों में आज भी प्रसिद्ध हैं।

भिलाई इस्पात संयंत्र को जलापूर्ति के लिए कुर्बानी

गंगरेल बांध की स्थापना की मुख्य वजह भिलाई इस्पात संयंत्र भी है, जहाँ पर गंगरेल बांध की पानी को नहर के माध्यम से पहुंचाया जाता है। बांध निर्माण के दौरान 9 हजार परिवार जो 55 गांव के रहने वाले वाशिंदे थे, उन्हें उस वक्त के सरकार ने अनेक प्रकार की लोकलुभावन वादे कर गए ,जो कभी पुरा ना हुआ विस्थापन की वेदना सहने वाले 9 हजार परिवारों में से कुछ लोगों ने 1972 में जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर किया था, जिसके बाद छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद बिलासपुर हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश देते हुए कहा था, कि गंगरेल बांध में जितने भी परिवार प्रभावित हुए हैं उनका व्यवस्थित पुर्नवास हो।

किसी को 50 पैसे तो किसी को 24 रुपया मिला था मुआवजा राशि !

बांध के चलते प्रभावित परिवारों में से ज्यादातर परिवार आदिवासियों की है, जिन्हें पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने भिलाई इस्पात संयंत्र की निर्माण के चलते 50 पैसे तो किसी को 18 रुपए तो किसी को 10 और 24 रूपए देकर इनका घर – बार, जमीन – जायदाद, खेत – खलिहान, गांव – गली – मोहल्ला छिन लिया। आज ये सारे परिवार अपनी इन सारी छिनी हुई चीजों को सरकार से वापस तो नहीं मांग सकती, लेकिन सरकार को इनकी वेदना पर जरूर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि भिलाई इस्पात संयंत्र निर्माण कर पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी जी स्वयं तो आयरण लेडी के रूप में प्रसिद्ध हो गई, लेकिन जिनके कंधों पर पैर रख कर भिलाई इस्पात संयंत्र से लोहा बनाया गया वे गंगरेल बांध की विस्थापित 55 गांव के 9 हजार परिवार जिनकी कमर टुट गई है उनकी ओर देखना तो दूर किसी ने इनकी वेदना को सुनना भी पसंद नहीं किया है।

विनोद नेताम के साथ गेंद लाल सिन्हा की संयुक्त ख़बर

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