रोका-छेका का धरातल पर नहीं दिख रहा असर

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रोका – छेका अभियान छत्तीसगढ़ की पुरानी परंपरा है। इसके जरिए पशुओं को खुले में चरने के लिए नहीं छोड़ा जाता है। मवेशियों को घरों, शेड और गौठानों में रखा जाता है, जहां उनके लिए पानी और चारे की व्यवस्था होती है। कृषि पुत्र और प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री की दूरदर्शिता और महती योजना के तहत लगभग सभी जिलों में मवेशियों को रखने के लिए गौठानों की व्यवस्था की गई है।
जहां मवेशियों को रखा जा रहा है; उनके चारे की भी व्यवस्था की गई है। मवेशियों को संरक्षित करना फसलों को मवेशियों से बचाना और गोबर से कुदरती खाद बनाना इसका मकसद है, लेकिन प्रदेश के एक ऐसे जिला में इस अभियान के साथ “नरवा-गरुवा, घुरवा-बाड़ी” की पोल खोल कर हकीकत के आईने में प्रशासनिक लुटेरों नक्सलियों और भ्रष्टासुरों का असली चेहरा उजागर कर दिया है…

जिला कार्यालय के समीप बने “कम्पोजिट बिल्डिंग” में दर्जनों मवेशियों का जमावड़ा

गौठान की जगह सड़कों पर नजर आ रहें मवेशी, अब तो कलेक्ट्रेट परिसर भी अछूता नहीं रहा।

धमतरी (hct)। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के आह्वान पर जिले भर में गौठान योजना के अन्तर्गत व्यापक “रोका – छेका अभियान” की शुरुआत हो चुका है; जहाँ फसल कटाई तक पशुओं को चराने के लिए खुले में नहीं छोड़े जाना है, इसके बाद भी प्रमुख सड़कों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ने वाले मार्गों पर पशुओं का कब्जा, “रोका-छेका” अभियान की पोल खोलती नजर आ रही है।

अब तो कलेक्ट्रेट परिसर भी इन मवेशियों से अछूता नहीं रह गया है। जिला कार्यालय के समीप बने “कम्पोजिट बिल्डिंग” में दर्जनों मवेशियों का जमावड़ा रहता है; जिससे कार्यालय आने वालों को काफी परेशानी होती है एवं इन मवेशियों के कारण वहां काफी गंदगी भी पसरी होती है फिर भी इन मवेशियों को वहां से हटाने किसी को फुर्सत नहीं।

बीते 01 जुलाई से पूरे जिले में जोर- शोर के साथ रोका-छेका अभियान प्रारंभ किया गया जो सफल नहीं दिख रहा और नगर से लेकर ग्रामीण इलाकों की सड़कों पर मवेशियों के दिखने से यातायात प्रभावित तो हो ही रहा है साथ ही प्रमुख बात यह है कि एक तरफ दोपहिया वाहन चालक रात्रि के समय सड़क पर बैठे मवेशियों के जद में आकर दुर्घटना का शिकार हो रहें हैं और उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है तो दूसरी ओर भारी वाहनों की चपेट में आने से खुद भी उन बेजुबान जानवरों की मौत हो रही है अथवा बुरी तरह घायल हो रहें हैं।

फेल नजर आ रहा अभियान

गेंद लाल सिन्हा

गौठान की जगह सड़कों पर बेतरतीब नजर आते मवेशियों को आपने जरूर देखा होगा, जो पूरे सड़क को घेर कर बैठे रहते हैं जहाँ दोपहिया वाहन चालकों के साथ साथ वे पशु भी सुरक्षित नहीं है जो छत्तीसगढ़ सरकार के महत्वकांक्षी कहे जाने वाले गौठान योजना की सच्चाई बयां कर रही है।

अब सवाल यह उठता है कि प्रदेश सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना जिसमें पानी की तरह पैसा बहाया गया और खूब वाहवाही भी लुटी गई; फिर परिणाम सिफर क्यों हो रहा ? ऐसे में जब मवेशियों को सड़कों पर ही दिखना था तो गौठानों के निर्माण पर करोड़ों का खर्च आखिर क्यों किया गया। वर्तमान में भी गौठानों पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है, किंतु हाल के तो व्यवस्था लचर दिख रहा है तो आगे देखने वाली बात होगी कि गौठानों के पूर्ण विकसित होने से प्रदेश का कितना विकास होगा और तब मवेशियों के लिए व्यवस्था कैसी रहेगी।

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