जीवन रक्षक अस्पताल बना जीवन भक्षक

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बीते दिनो प्रदेश के बालोद जिला में एक गर्भवती महिला ने दर्द से तड़पते हुए सरकारी हास्पिटल में दम तोड़ दिया तो वहीं आज बिरगांव के सरकारी हास्पिटल की एक विडीयो सामने आई हैं। विडीयो में युवक बता रहे हैं कि वह अपनी पत्नी को प्रसव हेतु बिरगांव के सरकारी हास्पिटल में लेकर आया था, जहाँ पर डाक्टरों के द्वारा पीड़ा से तड़प रही गर्भवती महिला को कोरोना पाजिटिव बताकर उसे हास्पिटल में एडमिट ही नही किया ! जिसके बाद गर्भवती महिला की प्रसव उसके परिजन महिलाएं हास्पिटल के बाहर ही करने को मजबूर हो गए। अब हमारे सुधी पाठक ही बताये की इस मानवीय संवेदना पर असंवेदनशील कृत्य के लिए शासन और प्रशासन को किस शिष्टाचार के तहत निवेदन और आवेदन के साथ अर्ज किया जाए कि महोदय जी, सरकारी हास्पिटलो की व्यवस्था दिनो-दिन बद से बदतर होते जा रही है…। लौट आईये; बहुत हुआ लिठ्ठी चोखा बा अबहु बोरे बासी के मजा लेवव …

रायपुर (hct)। छत्तीसगढ़ राज्य; विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है। ग्रामीण इलाकों में यह समस्या और भी गंभीर है या फिर यह कह सकते हैं स्वास्थ्य सेवा नही के समान है सिर्फ बाबा जी की बुटी पर ही निर्भर है जो समय-समय पर भविष्यवाणी के तौर पर प्रदेशवासियों के साथ नाराज कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को दिखता है। ग्रामीण स्‍वास्‍थ्‍य सांख्यिकी 2018 के अनुसार कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर (सीएचसी) में स्‍वीकृत संख्‍या 652 की तुलना में विशेषज्ञों की रिक्तियां 595 (91.2 प्रतिशत) है। वहीं पीएचसी में स्‍वीकृत संख्‍या 793 की तुलना में डाक्‍टरों की रिक्तियां 434 (54.7प्रतिशत) है। यह चौकाने वाले आंकड़े 15वें वित्त आयोग के अध्‍यक्ष एन के सिंह की अध्‍यक्षता में आयोग के सदस्‍य और वरिष्‍ठ अधिकारियों की छत्तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकत कर जानकारी दे चुके हैं।

कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर पर मात्र 6 प्रतिशत सर्जन की उपलब्धता है। प्रदेश में सीएचसी पर 169 सर्जन की जरूरत है जिसमें से 163 पदों की स्वीकृति है, लेकिन सिर्फ 11 सर्जन इन केंद्रों पर काम कर रहे हैं। इसी तरह इन केंद्रों पर गायनाकोलॉजिस्ट के 163 स्वीकृत पदों में 21 पदों पर ही डॉक्टर काम कर रहे हैं। फिजिशियन के 13 पद और बाल रोग विशेषज्ञ के 12 पदों पर ही चिकित्सक काम कर रहे हैं।

शहरी और ग्रामीण इलाका मिलाकर पूरे छत्तीसगढ़ में 1525 विशेषज्ञ डॉक्टर के पद स्वीकृत हैं। इनमें से सिर्फ 175 काम कर रहे हैं। इसी तरह, मेडिकल ऑफिसर की 2,048 स्वीकृत पदों पर महज 1469 चिकित्सक काम कर रहे हैं। वहीं प्रदेश सरकार भी इस गंभीर समस्या से निजात पाने के लिए प्रयास कर रही है ऐसा माना जा सकता है। लेकिन हकीकत के धरातल पर बदलाव की तासीर आसानी से पहचान आ जाती है। सरकार की ओर से दुर्गम क्षेत्रों में काम करने वाले चिकित्सकों को विशेष भत्ता भी दिया जाता है। इसके अलावा सरकार ने मेडिकल कॉलेज से पास होने वाले डॉक्टर्स को भी 2 साल गांव भेजने के लिए बॉन्ड की राशि को पांच लाख से बढ़ाकर 25 लाख कर दिया है ताकि वे ग्रामीण इलाकों में सेवा दे सकें।

शिशु मृत्यु दर में टॉप 5 में प्रदेश, ग्रामीण इलाकों की हालत खराब

छत्तीसगढ़ का शिशु मृत्यु दर 39 है और इस तरह यह राज्य मध्यप्रदेश (47), असम (44), ओडिसा (44), उत्तरप्रदेश (43) और राजस्थान (41) के साथ इस मामले में शीर्ष पांच राज्यों में आता है। इसमें सबसे गंभीर बात छत्तीसगढ़ के ग्रामीम इलाकों में शिशु मृत्यु दर 41 है जो कि शहरी इलाकों से 10 अधिक है। शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्मे शिशुओं मे से एक वर्ष या इससे कम उम्र मे मर गये शिशुओं की संख्या है। राज्य का मातृत्व मृत्यु दर 173 है जो कि देश के दर 130 से बहुत ज्यादा है। मातृत्व मृत्यु दर को प्रति 1,00,000 जन्म के दौरान मृत्यु के अनुपात को दिखाता है। देश के अस्पतालो में औसत 1452 नवजात शिशुओं की मृत्यु एक दिन में होती है तो वहीं एक घंटे में 60 और एक मिनट में एक नवजात शिशु की मृत्यु अस्पतालो में होती है। इस देश में जच्चा – बच्चा कैसे सुरक्षित रह सकते है जब स्वास्थ्य केन्द्रों से लेकर अस्पताल तक लोगों को समय से उपचार नही मिल रहा है।

संस्थागत प्रसव के बाद एक भी बच्चे की मौत तक व्यवस्था पर सवाल जिंदा बना रहेगा। रोजाना पैदा होने वाले कुल शिशुओं में 50 फिसदी की हिस्सेदारी अकेले 8 ईएजी राज्य भी करते है जिनमे छत्तीसगढ़ भी शामिल है यहाँ की स्थितियाँ बेहद जर्जर मानी जाती है, तो वहीं अन्य राज्यो की स्थिति भी संतोषजनक नही है। छत्तीसगढ़ की आम जनता को सालो समय से स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने की चुनौती हो या फिर बुनियादी संरचानाओ का अभाव यह कमियां मिलकर जीवन रक्षक अस्पताल को जीवन भक्षक बना रही है, तो वंही गेड़ी कका में बचपना बिलबिला रहा है और कभी भौंरा खेलते हुए नजर आते है तो कभी कंच्चे ! कभी-कभी तो तीजहारिनों के साथ रेचुली झूलने में मगन होकर झूपत-झूपत आबे दाई करके ढोलकी भी पीटते नजर आते हैं ! मुख्यमंत्री निवास की एक गरिमा होती है मगर वह कहीं नजर नहीं आती। वहाँ आए दिन कुछ न कुछ कार्यक्रम आयोजित कर एक इवेंट हाउस में तब्दील किया जा चुका है ….!!

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