रायपुर प्रेस क्लब चुनाव : खाटी बनाम नई परिपाटी, के बीच मुकाबला
दर्जनों दावेदारों की भीड़ के बावजूद चुनाव सिमटा दो गैर-छत्तीसगढ़िया चेहरों पर, 13 जनवरी को होगा किस्मत कैद

रायपुर hct : रायपुर प्रेस क्लब में आगामी 13 जनवरी को होने जा रहे चुनाव ने एक बार फिर क्लब की अंदरूनी राजनीति, सत्ता-संतुलन और संवैधानिक सीमाओं को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यदि पिछले 15 वर्षों के कार्यकाल पर नजर डालें, तो यह साफ होता है कि अपवाद स्वरूप के.के. भैया को छोड़ दिया जाए, तो अधिकांश निर्वाचित अध्यक्षों ने किसी न किसी दौर में प्रेस क्लब को संस्था से अधिक अपनी जागीर के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।
संविधान सर्वोपरि
हालांकि, हर बार क्लब का संविधान ही निर्णायक ढाल बनकर सामने आया। तमाम दबाव, दांवपेंच और सत्ता के प्रयोगों के बावजूद संविधान ने किसी भी व्यक्ति को स्थायी रूप से क्लब पर काबिज नहीं होने दिया और वक्त आने पर उन्हें बाहर का रास्ता भी दिखाया।
संविधान की बात चली है तो यह उल्लेख जरूरी है कि एक कार्यकाल ऐसा भी रहा, जब तत्कालीन अध्यक्ष ने सारी मर्यादाएं लांघते हुए संविधान में मनचाहे संशोधन कर डाले—कुछ वैसा ही अंदाज, जैसा देश की बड़ी राजनीति में देखने को मिलता है। लेकिन समय ने यहां भी यह स्पष्ट कर दिया कि व्यक्ति कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, संस्था व्यक्ति से ऊपर होती है।
दर्जनों दावेदारों की भीड़
वर्तमान परिदृश्य में प्रेस क्लब की तस्वीर बहुत बदली हुई नहीं है, सिर्फ चेहरे बदले हैं। व्यवस्था, समीकरण और चुनावी रणनीतियां लगभग वही हैं। इसी माहौल में इस बार चुनावी बयार कुछ अधिक तेज है। मैदान में दर्जनों दावेदारों की भीड़ है और करीब 60 सदस्य विभिन्न पदों के लिए अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
हालांकि, संख्या बड़ी होने के बावजूद वास्तविक मुकाबला धीरे-धीरे दो प्रमुख चेहरों पर आकर सिमटता दिख रहा है। अधिकतर उम्मीदवार पुराने और परिचित हैं, लेकिन इस बार एक नया चेहरा ऐसा है, जिसने चुनावी गणित को अप्रत्याशित रूप से बदल दिया है।
खाटी और नई परिपाटी में होगा रोचक मुकाबला
गौरतलब है कि इन दोनों ही प्रमुख दावेदारों का ताल्लुक छत्तीसगढ़ से बाहर का है। एक ओर वर्षों से प्रेस क्लब की राजनीति में जमे खाटी और आजमाए हुए खिलाड़ी हैं, तो दूसरी ओर नई परिपाटी, नए समीकरण और नए दावों के साथ उतरा चेहरा है। यही टकराव इस चुनाव को साधारण प्रक्रिया से ऊपर उठाकर रोचक और निर्णायक बना रहा है।
अब यह फैसला प्रेस क्लब के मतदाताओं के हाथ में है कि वे अनुभव की निरंतरता को चुनते हैं या नई परिपाटी के प्रयोग पर भरोसा जताते हैं…

