Chhattisgarh

अवैध कब्जे पर कब चलेगा सुशासन का बुलडोजर..?

बालोद में अफसरशाही की फाइलों में फंसा कानून, कब्जाधारी बेखौफ...!

बालोद (डौंडी तहसील)देश भर में बुलडोजर की धमक गूंज रही है, मगर बालोद ज़िले के डौंडी तहसील अंतर्गत ग्राम कुसुमकसा में कानून खुद गली-गली भटकता फिर रहा है। दिल्ली से आए सख्त दिशा-निर्देशों, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और लगातार उठ रहे मीडिया सवालों के बावजूद यहां के अधिकारी अब भी “फाइल आगे बढ़ाने” की मुद्रा में हैं। हाल यह है कि जमीन पर कब्जा करने वाले नईम कुरैशी और वहीद अली जैसे लोग खुलेआम कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं, जबकि प्रशासन फाइलें पलटते हुए कंधे उचकाता नज़र आता है।

प्रशासनिक सुस्ती इस कदर हावी है कि जिन पर बुलडोजर चलना चाहिए था, वे अब उल्टे सवाल उठाने लगे हैं। अवैध कब्जाधारी नईम कुरैशी – जो एक सेवानिवृत्त वनकर्मी का पुत्र है, ने अपने खिलाफ खबर प्रकाशित करने वाले पत्रकार पर ही अवैध वसूली और मानसिक उत्पीड़न की झूठी शिकायत पुलिस अधीक्षक से कर दी है। सवाल उठता है जो कानून जमीन पर कब्जा छुड़वाने में असहाय है, क्या वो अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी हाथ डालेगा?

कानून की किताबों में दबा “क्लियर ऑर्डर”

देश की सर्वोच्च अदालत ने कई बार स्पष्ट किया है कि अवैध कब्जे किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे। केंद्र सरकार तक ने राज्यों को कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं, मगर कुसुमकसा में प्रशासनिक अमला शायद किसी और ही ग्रह पर बैठा है। यहाँ न तो भू-प्रबंधन कानून लागू होता दिखता है, न विशिष्ट राहत अधिनियम 1963 की धाराएं जागती हैं, और न ही आईपीसी की धारा 441 का कोई खौफ नजर आता है।

आलम यह है कि अफसरशाही केवल नोटिस भेजने, जवाब माँगने और फिर वही पुराना घिसा-पिटा “कार्रवाई प्रक्रिया में है” वाला राग अलापती रहती है। जबकि एक्शन लेना इतना मुश्किल नहीं रिकॉर्ड के आधार पर कब्जा हटाया जा सकता है, मुकदमा दायर किया जा सकता है, पुलिस सहयोग से स्थल पर जाकर अवैध निर्माण गिराया जा सकता है। लेकिन उसके लिए इरादा चाहिए, और यही इरादा आज सबसे दुर्लभ है।

गांव की गलियों से निकलकर सिस्टम पर सवाल

गांव की बात करें तो वहां वर्षों से वहीद अली’ जो धान खरीदी केंद्र में चपरासी है, अवैध रूप से ज़मीन पर कब्जा जमाए बैठा है। एक चपरासी का यह दुस्साहस खुद में यह बताने के लिए काफी है कि यहां ‘प्रशासनिक पकड़’ नाम की कोई चीज़ शेष नहीं बची। सामाजिक चर्चाएं, मीडिया रिपोर्ट्स और शिकायती आवेदन जब मिलकर भी किसी अधिकारी की नींद न तोड़ सकें, तो सवाल यह उठता है कि क्या “गांव की बात” ही कमतर मानी जाती है? या फिर यहां भी कोई ‘सैटिंग-सिंडिकेट’ अपनी ड्यूटी निभा रहा है?

जब कलेक्टर के बंगले पर कब्जा होगा तब जागेगा प्रशासन?

कानून की असल परीक्षा तब नहीं होती जब कोई गरीब झुग्गी झोपड़ी बनाता है — असली परीक्षा तब होती है जब रसूखदार खुलेआम कब्जा करें और सिस्टम मुंह फेर ले। और अगर यह हालात यूं ही बने रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब लोग कलेक्टर बंगले या सरकारी इमारतों पर भी कब्जा जमाने से नहीं हिचकिचाएंगे।

यह कोई “अलग-थलग” मामला नहीं है गुरूर क्षेत्र हो या राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बने अवैध ढांचे, स्थिति कमोबेश वही है। शासन की मंशा को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होती है, मगर जब वही प्रशासन कागज़ों की गठरी में सुशासन की धार को दबा दे, तो फिर आम जनता किससे उम्मीद करे ?

क्या बालोद के अफसर बुलडोजर चलाने के आदेश का इंतजार कर रहे हैं या बुलडोजर के नीचे आकर ही जागेंगे?
जब सुप्रीम कोर्ट, केंद्र सरकार, राज्य शासन और जनता – सब एक ही दिशा में खड़े हैं, तो यह प्रशासन किस दिशा में चल रहा है? और सबसे अहम क्या कुसुमकसा के बाद अगली बारी प्रशासनिक दफ्तरों की है ? जब तक ये सवाल अनुत्तरित रहेंगे, तब तक सुशासन सिर्फ पोस्टर पर चमकेगा, ज़मीन पर नहीं…

अमीत मंडावी संवाददाता
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